ईरान की नई चेतावनी से भारत की चिंता बढ़ी, हिंद महासागर तक युद्ध फैलने का खतरा; तेल और शिपिंग पर पड़ सकता है असर
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को लेकर ईरान की एक नई चेतावनी ने अब हिंद महासागर को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के सलाहकार याह्या रहीम सफावी ने कहा है कि अगर अमेरिका या इजरायल की ओर से दोबारा हमला होता है तो संघर्ष का दायरा हिंद महासागर और उसके आगे तक बढ़ सकता है। उनका बयान ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी Fars द्वारा जारी वीडियो में सामने आया।
यह बयान फिलहाल किसी नए सैन्य अभियान की घोषणा नहीं है, लेकिन इसका रणनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि संघर्ष पहले ही फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों तक पहुंच चुका है। अब हिंद महासागर का नाम सामने आने का मतलब है कि क्षेत्रीय तनाव का असर उन समुद्री रास्तों पर भी पड़ सकता है जिनसे एशिया का ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क जुड़ा हुआ है।
हिंद महासागर का जिक्र क्यों महत्वपूर्ण है?
हिंद महासागर केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। फारस की खाड़ी से निकलने वाली ऊर्जा आपूर्ति, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के रास्ते यूरोप-एशिया व्यापार तथा भारत के पश्चिम एशिया से समुद्री संपर्क इसी व्यापक समुद्री क्षेत्र से जुड़े हैं।
मौजूदा संघर्ष में पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज से गुजरने वाले कमोडिटी जहाजों की संख्या हाल के सप्ताह में काफी घट गई है। इसका सीधा असर केवल युद्ध क्षेत्र के देशों पर नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा और माल ढुलाई बाजार पर पड़ता है।
यही वजह है कि ईरान की नई चेतावनी को सिर्फ सैन्य बयान के रूप में नहीं देखा जा रहा। अगर तनाव वास्तव में हिंद महासागर के समुद्री क्षेत्र तक फैलता है, तो जहाजों की सुरक्षा, बीमा प्रीमियम, माल ढुलाई लागत और ऊर्जा आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल और समुद्री व्यापार
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए इस घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू कच्चे तेल की कीमत और उपलब्धता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है, इसलिए पश्चिम एशिया में लंबे समय तक रहने वाला सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय कीमतों के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
सितंबर में कच्चे तेल की कीमतों में पहले ही तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। भारत के अप्रैल-अगस्त 2026 के कच्चे तेल आयात बिल में भी कीमतों के बढ़ने का असर दिखाई दिया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल सालाना आधार पर काफी बढ़ा, जबकि आयात की मात्रा में गिरावट आई।
इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। महंगा कच्चा तेल परिवहन, विमानन, पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक, उर्वरक और कई औद्योगिक उत्पादों की लागत को प्रभावित कर सकता है। लंबे समय तक कीमतें ऊंची रहने पर महंगाई और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत ने तेल आपूर्ति के विकल्प बढ़ाने शुरू किए
हालांकि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह एक ही समुद्री मार्ग पर निर्भर नहीं है। हाल के महीनों में भारतीय रिफाइनरों ने अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने और सप्लाई में बदलाव करने की कोशिश की है।
Reuters के अनुसार, अगस्त में भारत के रूस से कच्चे तेल के आयात में गिरावट आई, जबकि इराक और कुछ अन्य स्रोतों से खरीद में बदलाव देखा गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारतीय रिफाइनर अक्टूबर-नवंबर की जरूरतों के लिए स्पॉट मार्केट से अतिरिक्त आपूर्ति तलाश रहे हैं।
इससे संकेत मिलता है कि भारत के पास कुछ वैकल्पिक विकल्प मौजूद हैं। लेकिन अगर संकट लंबे समय तक बना रहता है और कई समुद्री मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं, तो विकल्पों की लागत बढ़ना भी स्वाभाविक है।
खतरा सिर्फ तेल का नहीं, जहाजों की सुरक्षा का भी
हिंद महासागर तक संघर्ष फैलने की स्थिति में दूसरा बड़ा मुद्दा मर्चेंट शिपिंग की सुरक्षा होगा। पश्चिम एशिया से एशिया आने वाले जहाजों को पहले से ही कई संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों से गुजरना पड़ रहा है।
बाब-अल-मंदेब पर सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण जहाजों को लंबे वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं। इससे यात्रा का समय और ईंधन खर्च बढ़ता है। बीमा कंपनियां भी जोखिम वाले समुद्री क्षेत्रों में प्रीमियम बढ़ा सकती हैं।
अगर इसी तरह की स्थिति हिंद महासागर के बड़े हिस्से में बनती है तो इसका असर एशिया-अफ्रीका और एशिया-मध्य पूर्व व्यापार पर पड़ सकता है।
ईरान की चेतावनी के बाद अब नजर कूटनीति पर
ईरान की ओर से यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक संपर्क भी जारी हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान दोनों पक्षों से जुड़े प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की कोशिशें सामने आई हैं।
इसलिए आने वाले दिनों में सैन्य गतिविधियों के साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी महत्वपूर्ण रहेगा। ईरान की चेतावनी को फिलहाल संभावित प्रतिक्रिया के तौर पर पेश किया गया है, न कि हिंद महासागर में किसी निश्चित हमले या अभियान की घोषणा के रूप में।



