डायबिटीज और किडनी: 20 से 40 प्रतिशत मरीजों में CKD का खतरा, जानिए कैसे बचाएं किडनी
डायबिटीज को अक्सर ब्लड शुगर की बीमारी समझकर सिर्फ ग्लूकोज की रिपोर्ट पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और इसका असर किडनी पर भी पड़ सकता है। समस्या यह है कि किडनी को नुकसान पहुंचने की शुरुआत कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के होती है।
अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन (ADA) के 2026 के मानकों के मुताबिक, डायबिटीज से जुड़ी क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) लगभग 20 से 40 प्रतिशत डायबिटीज मरीजों में देखी जाती है। CKD आगे बढ़ने पर किडनी फेलियर और डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत तक पहुंच सकती है। डायबिटीज के साथ CKD होने पर हृदय संबंधी जोखिम भी बढ़ता है।
किडनी पर डायबिटीज का असर कैसे पड़ता है?
किडनी शरीर का प्राकृतिक फिल्टर है। यह खून से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किडनी के अंदर मौजूद बेहद छोटी रक्त वाहिकाएं इस फिल्ट्रेशन प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं।
लंबे समय तक ब्लड शुगर अधिक रहने पर इन संरचनाओं को नुकसान हो सकता है। समय के साथ पेशाब में एल्ब्यूमिन जैसे प्रोटीन का रिसाव शुरू हो सकता है और किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो सकती है। इसी प्रक्रिया से जुड़ी किडनी की बीमारी को आमतौर पर डायबिटिक किडनी डिजीज कहा जाता है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है। ADA के अनुसार CKD की पहचान में urinary albumin excretion और eGFR जैसे परीक्षण महत्वपूर्ण हैं।
शुरुआत में लक्षण क्यों नहीं दिखाई देते?
किडनी की बीमारी का शुरुआती चरण अक्सर “साइलेंट” हो सकता है। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, जबकि किडनी के कामकाज में धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो चुका हो।
इसीलिए डायबिटीज मरीजों में नियमित जांच सिर्फ शुगर, HbA1c या ब्लड प्रेशर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार पेशाब में एल्ब्यूमिन और खून में क्रिएटिनिन से निकाला गया eGFR जैसे परीक्षण किडनी की स्थिति को समझने में मदद कर सकते हैं।
जल्दी पहचान का फायदा यह है कि किडनी की कार्यक्षमता को बनाए रखने के लिए समय रहते उपचार, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर नियंत्रण तथा जीवनशैली में बदलाव किए जा सकते हैं।
सिर्फ शुगर नहीं, ब्लड प्रेशर भी महत्वपूर्ण
डायबिटीज के साथ किडनी की सुरक्षा में ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना भी अहम है। इसका एक कारण यह है कि ज्यादा सोडियम या नमक का सेवन ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है और हाई ब्लड प्रेशर किडनी पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) वयस्कों के लिए प्रतिदिन 2,000 मिलीग्राम से कम सोडियम, यानी लगभग 5 ग्राम से कम नमक लेने की सलाह देता है। WHO के अनुसार अधिक सोडियम का सेवन हाई ब्लड प्रेशर और किडनी समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम से जुड़ा है।
नमक कम करने के लिए सिर्फ नमकदानी देखना काफी नहीं
कई लोगों को लगता है कि खाना बनाते समय कम नमक डालने से सोडियम की समस्या खत्म हो जाती है। लेकिन पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ भी सोडियम का बड़ा स्रोत हो सकते हैं।
ब्रेड, चीज, इंस्टेंट फूड, नमकीन स्नैक्स, पैकेज्ड सॉस और कई तैयार खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा अधिक हो सकती है। इसलिए डायबिटीज और किडनी की सेहत को लेकर सतर्क व्यक्ति को सिर्फ टेबल सॉल्ट ही नहीं, बल्कि पूरे आहार पर ध्यान देना चाहिए।
पैक्ड फूड खरीदते समय Nutrition Facts या पोषण लेबल में sodium की मात्रा देखना उपयोगी आदत हो सकती है। घर में ताजी सामग्री से खाना बनाना और स्वाद के लिए मसालों, जड़ी-बूटियों तथा अन्य कम-सोडियम विकल्पों का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है।
क्या हर डायबिटीज मरीज की किडनी खराब होगी?
नहीं। 20–40 प्रतिशत का आंकड़ा यह बताता है कि डायबिटीज से जुड़ी CKD एक महत्वपूर्ण और आम जटिलता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर डायबिटीज मरीज की किडनी निश्चित रूप से खराब होगी। जोखिम व्यक्ति की डायबिटीज की अवधि, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर नियंत्रण, अन्य स्वास्थ्य स्थितियों तथा कई दूसरे कारकों पर निर्भर करता है।
यही कारण है कि “लक्षण आने पर जांच” की बजाय नियमित निगरानी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
भविष्य में सबसे बड़ा फायदा शुरुआती निगरानी से
डायबिटीज के मरीजों के लिए किडनी की सुरक्षा किसी एक भोजन या घरेलू उपाय पर निर्भर नहीं करती। इसका आधार लगातार बीमारी प्रबंधन है—ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को चिकित्सकीय लक्ष्य में रखना, निर्धारित दवाएं लेना, संतुलित भोजन करना, नमक की मात्रा पर ध्यान देना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार किडनी की जांच कराते रहना।



