Tarang Shakti 2.0: जोधपुर में पहली बार F-35 की एंट्री, 7 देशों के लड़ाकू विमान दिखाएंगे हवाई ताकत
जोधपुर। राजस्थान का जोधपुर एयरबेस अगले कुछ दिनों में दुनिया की कई प्रमुख वायु सेनाओं के लड़ाकू विमानों की गतिविधियों का गवाह बनने जा रहा है। भारतीय वायुसेना का बहुराष्ट्रीय हवाई युद्धाभ्यास ‘तरंग शक्ति 2.0’ 26 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इस बार अभ्यास की सबसे बड़ी खासियत अमेरिका के F-35A लड़ाकू विमानों की भागीदारी है।
अमेरिका छह F-35 और दो KC-135 टैंकर विमानों के साथ अभ्यास में शामिल होगा। भारत में किसी सैन्य अभ्यास के दौरान F-35 की यह पहली भागीदारी होगी। इससे पहले यह अमेरिकी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान भारत में Aero India जैसे एयर शो में दिखाई दे चुका है, लेकिन भारतीय वायुसेना के साथ इस तरह के बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में इसकी भागीदारी पहली बार हो रही है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि एयर शो में किसी विमान का प्रदर्शन और वास्तविक सैन्य अभ्यास में उसकी ऑपरेशनल क्षमताओं का इस्तेमाल दो अलग परिस्थितियां हैं।
जोधपुर में क्यों महत्वपूर्ण है F-35 की मौजूदगी?
F-35 को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के रूप में विकसित किया गया है। इसकी खासियत केवल इसकी गति या हथियार क्षमता नहीं है। इसका डिजाइन सेंसर, डेटा शेयरिंग, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और नेटवर्क-केंद्रित युद्धक क्षमता के साथ काम करने के लिए किया गया है।
यही कारण है कि F-35 की भागीदारी को केवल एक नए विदेशी फाइटर जेट के प्रदर्शन के रूप में देखना अधूरा होगा।
भारतीय वायुसेना के लिए ऐसे अभ्यासों का एक बड़ा उद्देश्य यह समझना होता है कि अलग-अलग देशों के एयरक्राफ्ट, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम और ऑपरेशनल प्रक्रियाएं एक साथ किस तरह काम कर सकती हैं।
वायुसेना के वाइस चीफ एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने भी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता के संदर्भ में दो पहलुओं पर जोर दिया है—भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करना और उस प्रक्रिया के दौरान आवश्यक विशेषज्ञता एवं तकनीकी क्षमता विकसित करना।
भारत खुद भी विकसित कर रहा है पांचवीं पीढ़ी की क्षमता
F-35 की मौजूदगी ऐसे समय हो रही है जब भारत अपनी पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू विमान क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।
इसलिए ‘तरंग शक्ति 2.0’ का महत्व केवल विदेशी विमानों को करीब से देखने तक सीमित नहीं है। ऐसे अभ्यासों में भारतीय वायुसेना को अलग-अलग ऑपरेशनल अवधारणाओं, मिशन प्लानिंग, एयर कॉम्बैट सपोर्ट और संयुक्त अभियानों से जुड़ा व्यावहारिक अनुभव मिलता है।
पांचवीं पीढ़ी की एयर पावर में केवल नया विमान हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होता। उसके साथ सेंसर फ्यूजन, डेटा लिंक, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सुरक्षित संचार, हथियार प्रणाली और ग्राउंड सपोर्ट जैसी पूरी व्यवस्था विकसित करनी पड़ती है।
इसी वजह से एयर मार्शल दीक्षित ने क्षमता निर्माण के साथ विशेषज्ञता विकसित करने को भी महत्वपूर्ण बताया है।
सात देशों के एयरक्राफ्ट एक साथ करेंगे अभ्यास
‘तरंग शक्ति 2.0’ में भारत समेत सात देश अपने एयरक्राफ्ट के साथ भाग ले रहे हैं। इनमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, फ्रांस, जर्मनी, श्रीलंका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
अभ्यास में शामिल प्रमुख विमान इस प्रकार हैं:
| देश | प्रमुख विमान |
|---|---|
| भारत | राफेल, Su-30 MKI, LCA तेजस, जगुआर, मिराज-2000, MiG-29 |
| अमेरिका | 6 F-35, 2 KC-135 |
| फ्रांस | 7 राफेल, 3 A400M, 2 MRTT |
| यूएई | 6 F-16, 1 Global 6000 |
| जर्मनी | 2 A400M |
| ऑस्ट्रेलिया | 1 C-130 |
| बांग्लादेश | 1 C-130 |
| श्रीलंका | 1 King Air 350 |
इस सूची से स्पष्ट है कि अभ्यास में केवल फाइटर जेट ही शामिल नहीं हैं। एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग, ट्रांसपोर्ट और सपोर्ट प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
युद्ध की आधुनिक अवधारणा में लड़ाकू विमान अकेले काम नहीं करते। हवा में लंबे समय तक अभियान चलाने के लिए टैंकर, परिवहन विमान, निगरानी प्रणाली, कमांड एवं कंट्रोल और लॉजिस्टिक सपोर्ट की जरूरत होती है।
32 देश ऑब्जर्वर के तौर पर रहेंगे मौजूद
अभ्यास को व्यापक अंतरराष्ट्रीय भागीदारी देने के लिए 32 देशों को ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल किया जा रहा है।
वायुसेना के अनुसार कुल 65 देशों को आमंत्रित किया गया था और भागीदारी का चयन अभ्यास के निर्धारित ‘कंस्ट्रक्ट’ के आधार पर किया गया।
इसका अर्थ यह है कि अभ्यास का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक देशों के विमान बुलाना नहीं है। इसमें शामिल देशों की क्षमताओं और उनके साथ संभावित इंटरऑपरेबिलिटी को ध्यान में रखकर अभ्यास का स्वरूप तैयार किया गया है।
यानी प्रत्येक विमान के लिए केवल उड़ान भरना लक्ष्य नहीं होगा, बल्कि अलग-अलग एयरफोर्स के बीच संयुक्त ऑपरेशनल प्रक्रियाओं का अभ्यास भी महत्वपूर्ण रहेगा।
पाकिस्तान सीमा के करीब होने से बढ़ता है रणनीतिक महत्व
जोधपुर एयरबेस की भौगोलिक स्थिति भी इस अभ्यास को खास बनाती है। पश्चिमी राजस्थान पाकिस्तान सीमा के करीब है। ऐसे में यहां होने वाला बड़ा बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास क्षेत्र की रणनीतिक संवेदनशीलता के कारण अतिरिक्त ध्यान आकर्षित करता है।
हालांकि इस अभ्यास को किसी एक देश के खिलाफ सैन्य गतिविधि के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह एक बहुराष्ट्रीय प्रशिक्षण और ऑपरेशनल इंटरऑपरेबिलिटी अभ्यास है।
फिर भी पश्चिमी क्षेत्र में भारतीय वायुसेना के प्रमुख लड़ाकू विमानों और मित्र देशों के एयरक्राफ्ट की संयुक्त गतिविधियां भारतीय वायु शक्ति की परिचालन तैयारियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
2024 के तरंग शक्ति से कितना अलग है इस बार का अभ्यास?
‘तरंग शक्ति’ का पहला संस्करण 2024 में आयोजित हुआ था और इसे दो चरणों में बांटा गया था। पहला चरण तमिलनाडु के सुलूर एयरबेस और दूसरा चरण जोधपुर में आयोजित हुआ था।
2024 के अभ्यास में फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, यूएई और अमेरिका समेत कई देशों ने भाग लिया था। भारतीय वायुसेना ने भी राफेल, Su-30 MKI, Mirage-2000, Jaguar, Tejas और MiG-29 जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म के साथ अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया था।
जोधपुर में हुए दूसरे चरण में अमेरिका के A-10 और F-16, ऑस्ट्रेलिया के EA-18G Growler, ग्रीस और यूएई के F-16 सहित कई विदेशी विमान शामिल हुए थे।
अब 2026 के संस्करण में F-35 की भागीदारी इस अभ्यास के तकनीकी और ऑपरेशनल आयाम को एक नया स्तर देती है।
भारत के लिए असली फायदा क्या है?
ऐसे अभ्यासों का सबसे बड़ा फायदा किसी एक विमान की क्षमता देखने से ज्यादा संयुक्त ऑपरेशन की समझ विकसित करना होता है।
उदाहरण के लिए, अलग-अलग देशों की वायु सेनाएं अलग कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल, मिशन प्लानिंग प्रक्रिया और एयर ऑपरेशन तकनीक इस्तेमाल करती हैं। वास्तविक बहुराष्ट्रीय अभियान की स्थिति में इन प्रणालियों को एक-दूसरे के साथ काम करना पड़ता है।
अभ्यास के दौरान इन्हीं प्रक्रियाओं को वास्तविक उड़ान परिस्थितियों में परखा जाता है।
भारत के लिए यह अनुभव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय वायुसेना एक साथ कई प्रकार के प्लेटफॉर्म संचालित करती है। स्वदेशी तेजस से लेकर Su-30 MKI, राफेल, Mirage-2000 और MiG-29 तक अलग-अलग पीढ़ियों और मूल देशों की प्रणालियां भारतीय बेड़े का हिस्सा हैं।
ऐसे में नेटवर्क और इंटरऑपरेबिलिटी भविष्य की एयर वॉरफेयर क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
आगे की दिशा पांचवीं पीढ़ी से आगे जाएगी
F-35 की मौजूदगी से भारत में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर चर्चा जरूर तेज होगी, लेकिन इस अभ्यास का महत्व केवल संभावित विमान खरीद से जोड़ना उचित नहीं होगा।
भारतीय वायुसेना के लिए लंबी अवधि की चुनौती एक ऐसी एयर कॉम्बैट प्रणाली विकसित करना है जिसमें विमान, हथियार, सेंसर, ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और कमांड नेटवर्क एक साथ काम करें।



