नशामुक्त भारत 2047: ड्रग तस्करी के पूरे नेटवर्क पर वार की तैयारी, दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन
नई दिल्ली, 22 सितंबर 2026। भारत में नशे के खिलाफ लड़ाई अब केवल ड्रग्स की खेप पकड़ने और तस्करों की गिरफ्तारी तक सीमित रखने की कोशिश नहीं है। केंद्र सरकार ने अगले तीन वर्षों के लिए एक ऐसी रणनीति तैयार की है, जिसमें ड्रग तस्करी के नेटवर्क, सिंथेटिक ड्रग्स, प्रीकर्सर केमिकल्स, अवैध खेती, डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी से होने वाली गतिविधियों के साथ-साथ नशे की मांग और पुनर्वास को भी शामिल किया गया है।
इसी व्यापक रणनीति की समीक्षा के लिए नई दिल्ली में 22 और 23 सितंबर को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स यानी ANTF प्रमुखों का तीसरा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। इसमें 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ANTF प्रमुखों के अलावा संबंधित सरकारी विभागों और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं।
2047 का लक्ष्य, लेकिन असली परीक्षा 2026-29 की
सरकार के लिए 2047 का नशामुक्त भारत एक लंबी अवधि का लक्ष्य है, लेकिन इसे हासिल करने के लिए तत्काल फोकस Vision Document on Narcotics Control 2026-2029 पर है। यह दस्तावेज 26 जून 2026 को जारी किया गया था और इसमें अलग-अलग केंद्रीय एजेंसियों तथा राज्यों के लिए समयबद्ध कार्य निर्धारित किए गए हैं।
इस योजना की खास बात यह है कि इसमें ड्रग समस्या को सिर्फ कानून-व्यवस्था का विषय नहीं माना गया है। रणनीति को चार प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है—प्रवर्तन व खुफिया ऑपरेशन, प्रीकर्सर एवं सिंथेटिक ड्रग्स नियंत्रण, मांग में कमी व हार्म रिडक्शन तथा क्षमता निर्माण एवं समन्वय।
यानी आगे की लड़ाई में यह देखना उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि कितनी खेप पकड़ी गई, जितना यह पता लगाना कि उस खेप के पीछे कौन-सा नेटवर्क था, पैसा कहां से आया, रसायन कहां से पहुंचे और वितरण की डिजिटल व्यवस्था कैसे संचालित हुई।
सम्मेलन में आठ तकनीकी सत्र, फोकस बदले हुए ड्रग नेटवर्क पर
दो दिवसीय सम्मेलन में आठ तकनीकी सत्र रखे गए हैं। इनमें संस्थागत व्यवस्था, ड्रग नेटवर्क और कार्टेल को तोड़ना, मांग में कमी, रोकथाम एवं पुनर्वास, प्रवर्तन की प्रभावशीलता, प्रीकर्सर और सिंथेटिक ड्रग्स, अवैध खेती तथा डार्कनेट-क्रिप्टो जांच जैसे विषय शामिल हैं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्रग तस्करी का तरीका लगातार बदल रहा है। पारंपरिक सीमा-पार तस्करी के साथ डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल भी चुनौती बन रहा है। सरकार ने Vision Document में सभी ANTF में डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी जांच से जुड़ी क्षमताओं को मजबूत करने तथा तकनीक और AI आधारित विश्लेषण के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है।
इसका अर्थ है कि आने वाले वर्षों में एंटी-ड्रग जांच में केवल सड़क, सीमा, बंदरगाह और हवाईअड्डे ही महत्वपूर्ण नहीं होंगे; डिजिटल लेन-देन, ऑनलाइन नेटवर्क और साइबर सुराग भी जांच का हिस्सा बनेंगे।
आंकड़े बताते हैं कि चुनौती कितनी बड़ी है
सरकारी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में उपलब्ध आंकड़े भारत में नशीले पदार्थों की समस्या के बड़े पैमाने की ओर संकेत करते हैं। 2019 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 3.1 करोड़ लोग कैनाबिस और 2.3 करोड़ लोग ओपिओइड का इस्तेमाल करते थे। यह आंकड़ा पुराना है और इसे 2026 की वर्तमान स्थिति का सीधा अनुमान नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन इससे समस्या की ऐतिहासिक गंभीरता का अंदाजा जरूर मिलता है।
दूसरी ओर, प्रवर्तन के स्तर पर भी गतिविधियां बड़े पैमाने पर हुई हैं। 2025 में एजेंसियों ने 1,240.9 टन नशीले पदार्थ जब्त किए, 1,83,675 गिरफ्तारियां कीं और 1,48,063 मामले दर्ज किए। जब्त पदार्थों का अनुमानित मूल्य ₹18,227 करोड़ बताया गया है।
हालांकि, विशेषज्ञ दृष्टि से केवल जब्ती की मात्रा को सफलता का अंतिम पैमाना मानना पर्याप्त नहीं होगा। किसी नेटवर्क के शीर्ष संचालकों तक पहुंचना, उसकी वित्तीय व्यवस्था तोड़ना, अवैध उत्पादन बंद करना और नशे की मांग को कम करना ज्यादा व्यापक परिणाम दिखा सकता है।
भारत की भौगोलिक स्थिति भी बड़ी चुनौती
भारत की स्थिति दक्षिण एशिया के उन क्षेत्रों के बीच है जहां लंबे समय से ड्रग तस्करी के प्रमुख मार्ग सक्रिय रहे हैं। UNODC ने भी दक्षिण एशिया को अफगानिस्तान केंद्रित Golden Crescent और म्यांमार केंद्रित Golden Triangle के बीच स्थित क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया है।
इसके अलावा समुद्री मार्ग, हवाई नेटवर्क और बदलते डिजिटल माध्यम तस्करी के तरीके को और जटिल बनाते हैं। पूर्वोत्तर भारत में सिंथेटिक ड्रग्स से जुड़ी चुनौती भी महत्वपूर्ण है। UNODC की हालिया रिपोर्ट में भारत में एम्फेटामाइन-टाइप स्टिमुलेंट्स की जब्ती और म्यांमार से जुड़े तस्करी प्रवाह पर भी ध्यान दिया गया है।
यही वजह है कि भारत की रणनीति में सीमा सुरक्षा, पुलिस कार्रवाई, खुफिया जानकारी, वित्तीय जांच और अंतर-एजेंसी समन्वय को एक साथ जोड़ने की जरूरत बढ़ रही है।
अब सिर्फ तस्कर नहीं, पूरा इकोसिस्टम निशाने पर
Vision Document की सबसे अहम दिशा यह है कि कार्रवाई को सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों तक ले जाने की कोशिश की जा रही है। इसमें ड्रग नेटवर्क और कार्टेल को तोड़ना, सिंथेटिक ड्रग्स और गुप्त प्रयोगशालाओं की पहचान, प्रीकर्सर केमिकल्स पर नियंत्रण तथा अवैध खेती के खिलाफ कार्रवाई शामिल है।
इसके साथ मांग में कमी और पुनर्वास को भी रणनीति का हिस्सा बनाया गया है। इसका मतलब है कि यदि किसी क्षेत्र में केवल सप्लाई रोक दी जाती है लेकिन नशे की मांग और उपचार की जरूरत को नजरअंदाज किया जाता है, तो समस्या दूसरे स्रोत या दूसरे पदार्थ के रूप में दोबारा उभर सकती है।
इसलिए आने वाले वर्षों में Supply Reduction + Demand Reduction + Harm Reduction के बीच संतुलन इस नीति की वास्तविक परीक्षा होगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ रहा सहयोग
भारत का ड्रग नियंत्रण अभियान अंतरराष्ट्रीय संदर्भ से भी जुड़ा है। सितंबर 2026 में अमेरिका ने 23 देशों को प्रमुख ड्रग ट्रांजिट या अवैध ड्रग उत्पादन वाले देशों की सूची में शामिल किया, जिसमें भारत भी था। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति निर्धारण में यह स्पष्ट किया गया कि इस सूची में किसी देश का शामिल होना अपने-आप में यह नहीं दर्शाता कि उस सरकार ने नशीले पदार्थों के खिलाफ पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं।
इसलिए भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व दो स्तरों पर है—एक तरफ सीमा-पार नेटवर्क और विदेश में मौजूद आरोपित तस्करों तक पहुंच, दूसरी तरफ प्रीकर्सर केमिकल्स और डिजिटल वित्तीय नेटवर्क पर सहयोग।
आगे की असली चुनौती: नतीजे जमीन पर दिखें
दो दिवसीय सम्मेलन का महत्व इस बात में है कि 2026-29 की योजना अब केवल दस्तावेज न रहकर राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों के काम में कितनी प्रभावी तरीके से उतरती है। सरकार ने इसे Whole of Government और Whole of Society दृष्टिकोण से लागू करने की बात कही है।
2029 तक सफलता का मूल्यांकन केवल गिरफ्तारियों या जब्त ड्रग्स के वजन से नहीं, बल्कि उन नेटवर्कों की क्षमता को कमजोर करने, अवैध वित्तीय प्रवाह पर कार्रवाई, सिंथेटिक ड्रग्स की उपलब्धता पर नियंत्रण, अवैध खेती में कमी और नशे से प्रभावित लोगों तक प्रभावी उपचार एवं पुनर्वास पहुंचाने जैसे संकेतकों से किया जाना अधिक उपयोगी होगा।



