सैटेलाइट अंतरिक्ष से जमीन पर क्यों नहीं गिरती? जानिए कक्षा में घूमने का पूरा विज्ञान
नई दिल्ली: रात के आसमान में दिखाई देने वाले चमकीले बिंदुओं से लेकर GPS, मौसम की भविष्यवाणी, टीवी प्रसारण और इंटरनेट तक—सैटेलाइट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन एक सवाल आज भी बेहद दिलचस्प है: जब पृथ्वी हर वस्तु को अपने गुरुत्वाकर्षण से खींचती है, तो हजारों किलोमीटर ऊपर मौजूद सैटेलाइट नीचे क्यों नहीं गिरती?
इसका जवाब यह नहीं है कि सैटेलाइट पर गुरुत्वाकर्षण का असर नहीं होता। वास्तव में वह लगातार पृथ्वी की ओर गिर रही होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके पास आगे की दिशा में इतनी तेज गति होती है कि पृथ्वी की सतह लगातार उसके नीचे से दूर मुड़ती जाती है।
यही अंतरिक्ष में कक्षा यानी Orbit का मूल विज्ञान है।
सैटेलाइट वास्तव में लगातार गिर रही होती है
सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने के बाद रॉकेट उसे केवल ऊंचाई ही नहीं देता, बल्कि जरूरी क्षैतिज वेग भी देता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। अगर आप किसी ऊंची जगह से गेंद को सीधा नीचे छोड़ दें तो वह जमीन पर गिर जाएगी। अगर उसे आगे की ओर फेंकें तो वह कुछ दूरी तय करने के बाद जमीन पर पहुंचेगी। अब कल्पना कीजिए कि गेंद को इतनी अधिक क्षैतिज गति दे दी जाए कि जब तक वह गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे आती है, तब तक पृथ्वी की सतह भी उसकी दिशा में उतनी ही तेजी से नीचे मुड़ चुकी हो।
ऐसी स्थिति में गेंद पृथ्वी से टकराने के बजाय उसके चारों ओर घूमती रहेगी।
सैटेलाइट के साथ मूल रूप से यही होता है।
वह गुरुत्वाकर्षण से पृथ्वी की ओर गिरती रहती है, लेकिन उसकी आगे की गति इतनी अधिक होती है कि वह पृथ्वी की सतह तक पहुंच नहीं पाती।
फिर वह अंतरिक्ष में भाग क्यों नहीं जाती?
यहां पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण निर्णायक भूमिका निभाता है।
सैटेलाइट को आगे बढ़ने की जड़त्वीय प्रवृत्ति होती है, जबकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उसकी गति की दिशा को लगातार मोड़ता रहता है। इस लगातार दिशा परिवर्तन के कारण सैटेलाइट सीधी रेखा में अंतरिक्ष की ओर निकलने के बजाय घुमावदार रास्ते पर पृथ्वी की परिक्रमा करती रहती है।
इसलिए कक्षा को केवल यह कहकर समझाना कि “सेंट्रीफ्यूगल फोर्स सैटेलाइट को बाहर की ओर धकेलता है और गुरुत्वाकर्षण अंदर खींचता है” अधूरा है।
कक्षा के संदर्भ में जड़त्वीय गति और गुरुत्वाकर्षण से पैदा होने वाला अभिकेंद्रीय त्वरण ज्यादा सटीक वैज्ञानिक व्याख्या है।
एक आसान उदाहरण: रस्सी से बंधा पत्थर
रस्सी में पत्थर बांधकर उसे गोल-गोल घुमाइए। पत्थर लगातार सीधी दिशा में निकलने की कोशिश करेगा, लेकिन रस्सी उसे अंदर की ओर खींचती रहेगी। परिणामस्वरूप उसका रास्ता गोल हो जाता है।
सैटेलाइट के मामले में रस्सी मौजूद नहीं होती। उसकी भूमिका पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण निभाता है।
अंतर यही है कि सैटेलाइट को पृथ्वी के चारों ओर घूमते रहने के लिए किसी भौतिक रस्सी की जरूरत नहीं होती।
क्या सभी सैटेलाइट एक ही गति से घूमती हैं?
नहीं। सैटेलाइट की कक्षीय गति उसकी ऊंचाई पर निर्भर करती है।
आम तौर पर कम ऊंचाई वाली कक्षा (LEO) में मौजूद सैटेलाइट को पृथ्वी के चारों ओर बने रहने के लिए ज्यादा कक्षीय गति चाहिए। जैसे-जैसे कक्षा की ऊंचाई बढ़ती है, कक्षीय गति कम हो सकती है, लेकिन एक चक्कर पूरा करने में ज्यादा समय लगता है।
यही वजह है कि अलग-अलग मिशनों के लिए अलग-अलग कक्षाएं चुनी जाती हैं।
मसलन, पृथ्वी की तस्वीरें लेने वाले कई उपग्रह अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में काम करते हैं, जबकि संचार और मौसम संबंधी कुछ मिशनों के लिए बहुत ऊंची कक्षाएं अधिक उपयोगी हो सकती हैं।
अंतरिक्ष में हवा नहीं है, लेकिन पूरी तरह शून्य भी नहीं
एक आम धारणा है कि सैटेलाइट के आसपास बिल्कुल हवा नहीं होती। वास्तविकता थोड़ी अलग है।
पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में गैस के बेहद विरल कण मौजूद रहते हैं। कम ऊंचाई वाली कक्षाओं में ये कण सैटेलाइट के साथ मामूली घर्षण पैदा कर सकते हैं। इसे Atmospheric Drag कहा जाता है।
यही कारण है कि कुछ Low Earth Orbit सैटेलाइट धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा खोती हैं और उनकी कक्षा नीचे आने लगती है। ऐसी स्थिति में उन्हें समय-समय पर छोटे रॉकेट थ्रस्टर से ऑर्बिट बूस्ट देना पड़ सकता है।
इसलिए यह कहना कि सैटेलाइट एक बार अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद हमेशा बिना ईंधन के घूमती रहती है, पूरी तरह सही नहीं है।
फिर सैटेलाइट को ईंधन की जरूरत कब पड़ती है?
सैटेलाइट को हर समय इंजन चलाने की जरूरत नहीं होती। अंतरिक्ष में मुख्य इंजन लगातार चलाकर उसे आगे बढ़ाना आवश्यक नहीं है।
लेकिन कई उपग्रहों में छोटे thrusters लगाए जाते हैं। इनका इस्तेमाल कक्षा में मामूली सुधार करने, दिशा नियंत्रित करने या वायुमंडलीय घर्षण से हुई ऊंचाई की कमी की भरपाई करने के लिए किया जा सकता है।
यानी ईंधन का इस्तेमाल मुख्य रूप से “चलते रहने” के लिए नहीं, बल्कि कक्षा को नियंत्रित और बनाए रखने के लिए होता है।
अगर सैटेलाइट की गति कम हो जाए तो क्या होगा?
यही इस पूरे विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अगर किसी सैटेलाइट की कक्षीय गति इतनी कम हो जाए कि वह अपनी निर्धारित कक्षा बनाए न रख सके, तो गुरुत्वाकर्षण उसके रास्ते को अधिक तेजी से पृथ्वी की ओर मोड़ देगा। निचली कक्षा में आने पर वायुमंडलीय घर्षण बढ़ सकता है, जिससे गति और कम हो सकती है।
आखिरकार सैटेलाइट Re-entry कर सकती है।
वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय अत्यधिक गति और वायु प्रतिरोध के कारण उसका तापमान बहुत बढ़ सकता है और कई वस्तुएं जलकर नष्ट हो जाती हैं। बड़ी या विशेष रूप से डिजाइन की गई वस्तुओं के कुछ हिस्से पृथ्वी तक भी पहुंच सकते हैं।
और अगर गति बहुत ज्यादा हो जाए?
दूसरी तरफ, यदि किसी वस्तु को पृथ्वी से बहुत अधिक गति दे दी जाए, तो वह पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण पकड़ से बाहर निकलने की दिशा में जा सकती है।
इसे Escape Velocity से समझा जाता है। पृथ्वी की सतह के पास आदर्श परिस्थितियों में यह लगभग 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड है।
हालांकि वास्तविक अंतरिक्ष मिशनों में कहानी इतनी सरल नहीं होती, क्योंकि रॉकेट का रास्ता, पृथ्वी का घूर्णन और विभिन्न कक्षीय तकनीकें भी भूमिका निभाती हैं।
यही विज्ञान हमारी रोजमर्रा की जिंदगी चलाता है
सैटेलाइट की कक्षा का यह विज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है। आज हम जिन कई सेवाओं पर निर्भर हैं, उनके पीछे उपग्रह मौजूद हैं।
GPS और नेविगेशन, मौसम की निगरानी, कृषि और वन क्षेत्रों की मैपिंग, आपदा प्रबंधन, संचार, टीवी प्रसारण और पृथ्वी की निगरानी—इन सभी में अलग-अलग प्रकार की सैटेलाइट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
किसी सैटेलाइट का सही कक्षा में पहुंचना इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि थोड़ी सी भी कक्षीय त्रुटि उसके मिशन की उपयोगिता को प्रभावित कर सकती है।
असली सवाल “सैटेलाइट गिरती क्यों नहीं?” नहीं है
वैज्ञानिक दृष्टि से इस सवाल को थोड़ा बदलना ज्यादा सही होगा।
सैटेलाइट गिर रही है—लेकिन पृथ्वी को मिस करती हुई।
उसकी आगे की गति उसे पृथ्वी की सतह से आगे ले जाती है और गुरुत्वाकर्षण लगातार उसके रास्ते को पृथ्वी की ओर मोड़ता रहता है। इन दोनों के कारण वह पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली कक्षा में बनी रहती है।



