जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पहले दिन ही टकराव:
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा का शरद सत्र शुरू होते ही सदन उस राजनीतिक टकराव का मंच बन गया, जिसकी आहट पिछले कई दिनों से सुनाई दे रही थी। सोमवार को पहले ही दिन बीजेपी विधायकों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की, जिसके जवाब में नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और अन्य सत्ता पक्ष के सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को जोरदार तरीके से उठाया। हंगामा इतना बढ़ा कि विधानसभा की कार्यवाही सुबह करीब 11 बजे ही पूरे दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी।
यह सिर्फ सदन में नारेबाजी का मामला नहीं है। इसके पीछे जम्मू-कश्मीर की राजनीति के दो बड़े सवाल आमने-सामने हैं—निर्वाचित सरकार से रोजमर्रा के शासन का हिसाब कैसे लिया जाए और राज्य का दर्जा बहाल होने की संवैधानिक-राजनीतिक मांग को कितना प्राथमिक मुद्दा बनाया जाए।
शोक प्रस्ताव के बाद बदला सदन का माहौल
सत्र की शुरुआत दिवंगत पूर्व सदस्यों को श्रद्धांजलि और शोक प्रस्ताव के साथ हुई। इसके बाद बीजेपी सदस्यों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा समेत कुछ विधायक वेल तक पहुंच गए।
विपक्ष के विरोध के बीच सीपीआई(एम) विधायक एमवाई तारिगामी ने राज्य का दर्जा बहाल नहीं होने का मुद्दा उठाया। इसके बाद सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी नारेबाजी शुरू कर दी और सदन में दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए।
स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने सदस्यों से प्रश्नकाल चलने देने की अपील की और सदन की मर्यादा बनाए रखने को कहा। हंगामा जारी रहने पर उन्होंने सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि “गुंडागर्दी नहीं चलेगी।” इसके बावजूद कुछ विधायकों ने अपने सवाल सदन में उठाए।
बीजेपी किन मुद्दों पर सरकार को घेर रही है?
बीजेपी का फोकस केवल राज्य के दर्जे तक सीमित नहीं है। विपक्ष पहले से ही बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों की आउटसोर्सिंग, बिजली-पानी, बुनियादी सुविधाओं, कर्मचारियों की समस्याओं और चुनावी वादों को लेकर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी कर रहा था।
नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने सरकार पर आरोप लगाया कि करीब दो साल का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद कई सार्वजनिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि रोजमर्रा की प्रशासनिक समस्याओं का जवाब हर बार अधिकारों की कमी और राज्य का दर्जा बहाल नहीं होने के संदर्भ में नहीं दिया जा सकता।
आउटसोर्सिंग को लेकर भी बीजेपी ने पारदर्शिता और रोजगार से जुड़े सवाल उठाए हैं। हालांकि इन मामलों में विपक्ष के आरोपों को सरकार की ओर से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता; आने वाले दिनों में विधानसभा में इन पर विभागीय जवाब और दस्तावेज सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
सत्ता पक्ष के लिए राज्य का दर्जा क्यों अहम है?
नेशनल कॉन्फ्रेंस और उसके सहयोगी दलों के लिए जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा है। सत्तारूढ़ पक्ष का तर्क है कि निर्वाचित सरकार के बावजूद जम्मू-कश्मीर के पास पहले जैसी राज्य स्तरीय शक्तियां नहीं हैं और इस स्थिति का असर शासन पर पड़ता है।
यही वजह है कि जब बीजेपी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, तो सत्ता पक्ष राज्य के दर्जे की बहाली को व्यापक राजनीतिक संदर्भ के रूप में सामने रखता है।
लेकिन विधानसभा के मौजूदा टकराव की अहमियत यहीं है। राज्य का दर्जा एक बड़ा संवैधानिक-राजनीतिक प्रश्न है, जबकि बिजली, पानी, सड़क, भर्ती, अस्पताल और रोजगार जैसे मुद्दे तत्काल प्रशासनिक प्रश्न हैं। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प मानने से बहस अधूरी रह सकती है।
सरकार ने कहा- हर सवाल का जवाब देने को तैयार
उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि सरकार सभी मुद्दों पर जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन सवाल एक-एक करके पूछे जाने चाहिए।
सत्ता पक्ष की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि विपक्ष जनहित के मुद्दों पर चर्चा के बजाय हंगामे पर अधिक ध्यान दे रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष अपने आरोपों को विधानसभा में कितने ठोस सवालों, आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ रखता है और सरकार उनका क्या जवाब देती है।
छोटा सत्र भी बना राजनीतिक विवाद
इस बार विधानसभा का शरद सत्र 21 से 30 सितंबर तक निर्धारित है और इसमें सात बैठकें रखी गई हैं। सत्र की अवधि को लेकर भी बीजेपी पहले ही सरकार पर निशाना साध चुकी है और अधिक समय की मांग कर चुकी है।
वहीं स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने सत्र की अवधि पर उठाए गए सवालों के जवाब में कहा था कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा की औसत वार्षिक बैठकें राष्ट्रीय औसत से अधिक रही हैं। उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर में औसतन 28 बैठकें होती हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 24 का है।
इसलिए विवाद केवल “सत्र छोटा है या बड़ा” का नहीं है। असली सवाल यह है कि उपलब्ध सीमित समय में कितने महत्वपूर्ण मुद्दों पर वास्तविक चर्चा और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित हो पाती है।
आने वाले दिनों में इन मुद्दों पर रहेगी नजर
पहले दिन का हंगामा संकेत दे रहा है कि यह सत्र शांतिपूर्ण रहने वाला नहीं है। बेरोजगारी, भर्ती और आउटसोर्सिंग के साथ-साथ बिजली-पानी, कर्मचारियों की समस्याएं, आरक्षण और राज्य के दर्जे की बहाली जैसे मुद्दे सदन में फिर उभर सकते हैं। सत्र से पहले विपक्षी दलों ने भी इन विषयों को प्रमुखता देने की बात कही थी।
सत्र में कुछ समितियों की रिपोर्ट और निजी सदस्य विधेयक/प्रस्ताव भी एजेंडे का हिस्सा हैं। ऐसे में यदि नारेबाजी के बजाय इन विषयों पर विस्तृत बहस होती है, तो सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अपने-अपने दावों को रिकॉर्ड पर रखने का अवसर होगा।
जनता के लिए असली सवाल
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के इस टकराव को केवल बीजेपी बनाम नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। एक तरफ राज्य के दर्जे की बहाली का दीर्घकालिक सवाल है, दूसरी तरफ जनता की रोजमर्रा की जरूरतें हैं।
विधानसभा की प्रभावशीलता अंततः इस बात से तय होगी कि बिजली, पानी, रोजगार, भर्ती, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवालों पर कितनी ठोस चर्चा होती है और सरकार कितने स्पष्ट जवाब देती है।



