अरावली की खदानों से उठती धूल बनी सांसों का संकट, सीकर में सिलिकोसिस ने बढ़ाई चिंता
सीकर: अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाला पत्थर निर्माण और विकास की जरूरतों को पूरा करता है, लेकिन इस पत्थर को निकालने की प्रक्रिया का एक दूसरा पहलू भी है—खनन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों और आसपास रहने वाले परिवारों की सेहत। सीकर और आसपास के इलाकों में खदानों तथा स्टोन क्रशर से उठने वाली महीन धूल को लेकर सिलिकोसिस के बढ़ते मामलों की शिकायतें अब केवल श्रमिकों की समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि यह स्थानीय स्वास्थ्य और पर्यावरण का गंभीर सवाल बनती जा रही है।
खनन के दौरान ड्रिलिंग, पत्थर काटने और क्रशिंग से निकलने वाली धूल में सांस के साथ अंदर जाने वाले सिलिका कण फेफड़ों को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकते हैं। सिलिकोसिस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली बीमारी है। शुरुआती दौर में सामान्य थकान या सांस फूलने जैसी शिकायतें बाद में गंभीर श्वसन समस्या में बदल सकती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी राजस्थान के पत्थर खदान श्रमिकों में सिलिकोसिस की महत्वपूर्ण मौजूदगी दर्ज की गई है। एक अध्ययन में जांच किए गए 529 खदान श्रमिकों के एक्स-रे में 275 लोगों में सिलिकोसिस के रेडियोलॉजिकल प्रमाण मिले थे।
समस्या सिर्फ खदान के अंदर काम करने वालों तक सीमित नहीं
सीकर के प्रभावित इलाकों में सामने आ रही शिकायतों का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि धूल का असर केवल उन लोगों तक सीमित नहीं माना जा रहा जो सीधे खदान में काम करते हैं। खदान और क्रशर के आसपास रहने वाले परिवार भी लगातार धूल के संपर्क में आ सकते हैं। यही वजह है कि किसी क्षेत्र में खनन गतिविधियों का स्वास्थ्य प्रभाव समझने के लिए सिर्फ मजदूरों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है।
यदि आबादी के नजदीक खनन और क्रशिंग गतिविधियां चल रही हैं, तो सड़क, घर और आसपास का वातावरण भी धूल के संपर्क में आ सकता है। ऐसे में स्वास्थ्य निगरानी को श्रमिकों के साथ स्थानीय निवासियों तक विस्तारित करने की जरूरत सामने आती है।
स्यालोद्रा गांव और आसपास के क्षेत्र में स्थानीय लोगों की ओर से बीमारी और मौतों को लेकर गंभीर दावे किए गए हैं। हालांकि, इन स्थानीय दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि और विस्तृत सार्वजनिक आंकड़े अलग से सामने आना जरूरी है। यही अंतर बताता है कि प्रभावित क्षेत्र में नियमित स्वास्थ्य सर्वेक्षण और पारदर्शी डेटा कितना महत्वपूर्ण है।
आंकड़े बीमारी की पूरी तस्वीर क्यों नहीं दिखा सकते?
सिलिकोसिस की वास्तविक स्थिति समझने में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि उसकी पहचान है। कई मामलों में मजदूर लंबे समय तक सांस की तकलीफ को सामान्य मानकर काम करते रहते हैं। दूसरी ओर, सिलिकोसिस और दूसरी श्वसन बीमारियों के लक्षणों में समानता होने के कारण सही जांच में देरी हो सकती है।
राजस्थान में सिलिकोसिस से जुड़े सरकारी पंजीकरण और राहत तंत्र पर प्रकाशित शोध में 23,436 पंजीकृत मामलों का उल्लेख किया गया था। एक व्यापक समीक्षा में भी इसी आंकड़े को राजस्थान की सिलिकोसिस स्थिति के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।
एक अलग अध्ययन में राजस्थान के बलुआ पत्थर खदान श्रमिकों के बीच सिलिकोसिस की व्यापकता 37.3 प्रतिशत और सिलिको-ट्यूबरकुलोसिस की व्यापकता 7.4 प्रतिशत पाई गई थी। अध्ययन में बड़ी संख्या में श्रमिकों में फेफड़ों की कार्यक्षमता और छाती के एक्स-रे से जुड़ी असामान्यताएं भी दर्ज की गई थीं।
इन अध्ययनों का अर्थ यह नहीं है कि यही प्रतिशत सीकर की पूरी आबादी पर लागू होता है। लेकिन वे यह जरूर संकेत देते हैं कि सिलिका धूल के लगातार संपर्क वाले श्रमिकों में श्वसन संबंधी जोखिम को सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बीमारी सामने आने के बाद इलाज से ज्यादा जरूरी है बचाव
सिलिकोसिस को लेकर सबसे महत्वपूर्ण नीति सवाल यह है कि बीमारी सामने आने के बाद सहायता देने के साथ-साथ नए मामलों को रोका कैसे जाए। विशेषज्ञ साहित्य इसे प्रगतिशील और अपरिवर्तनीय बीमारी के रूप में वर्णित करता है, इसलिए धूल के संपर्क को कम करना शुरुआती स्तर पर ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
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खनन क्षेत्रों में प्रभावी धूल नियंत्रण, सुरक्षित कार्यप्रणाली, श्रमिकों के लिए उपयुक्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर बीमारी की पहचान इस समस्या से निपटने के प्रमुख हिस्से हैं। सिर्फ मुआवजा या बीमारी प्रमाणित होने के बाद मिलने वाली सहायता पर्याप्त समाधान नहीं हो सकती।
यहां एक और चुनौती अनौपचारिक और छोटे स्तर के खनन कार्यों की निगरानी है। राजस्थान में सिलिकोसिस पर प्रकाशित नीति विश्लेषणों में भी बीमारी की पहचान, चिकित्सकीय संसाधनों और राहत वितरण की जटिलताओं को प्रमुख चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है।
अरावली विवाद में स्वास्थ्य का पहलू भी महत्वपूर्ण
अरावली को लेकर चर्चा अक्सर खनन, जंगल, भूजल और पर्यावरण संरक्षण तक सीमित दिखाई देती है, लेकिन इसके साथ मानव स्वास्थ्य का सवाल भी जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार की एक आधिकारिक जानकारी में अरावली को मरुस्थलीकरण रोकने, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
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इसलिए आने वाले समय में अरावली क्षेत्र में खनन से जुड़े फैसलों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कोई गतिविधि आर्थिक रूप से कितनी उपयोगी है। यह भी देखना जरूरी होगा कि उसका स्थानीय हवा, पानी, जमीन और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
सीकर जैसे इलाकों में जरूरत एक ऐसी व्यवस्था की है जिसमें खनन क्षेत्र की नियमित पर्यावरणीय निगरानी के साथ श्रमिकों और आसपास की आबादी की स्वास्थ्य निगरानी भी हो। यदि किसी इलाके में बीमारी के मामलों और मौतों को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो उनका जवाब अनुमान या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण और सार्वजनिक आंकड़ों से मिलना चाहिए।



