पार्टी टूटे तो नाम-निशान किसे मिलता है
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में किसी पार्टी के भीतर बड़ा विभाजन होने पर लड़ाई केवल नेतृत्व की नहीं रहती। असली सवाल तब यह बन जाता है कि पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह और चुनावी पहचान किस गुट के साथ रहेगी। समाजवादी पार्टी के 2017 के विवाद से लेकर शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मामलों तक चुनाव आयोग ने अलग-अलग परिस्थितियों में इसी सवाल पर फैसला किया है। अब 2026 में तृणमूल कांग्रेस का विवाद भी इसी कानूनी ढांचे के सामने खड़ा है।
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हालिया मामले में चुनाव आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) का नाम और ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिन्ह दोनों गुटों के लिए फिलहाल रोक दिया है। आयोग के अनुसार एक पक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरा अरूप रॉय के नेतृत्व में पार्टी होने का दावा कर रहा है। दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों के लिए अलग नाम और अलग चुनाव चिन्ह के विकल्प देने को कहा गया है। आयोग ने साफ किया है कि यह अंतिम फैसला नहीं है और विवाद पर पैराग्राफ 15 के तहत विस्तृत निर्धारण किया जाना बाकी है।
2017 में समाजवादी पार्टी का मामला क्या था?
समाजवादी पार्टी के भीतर 2017 की खींचतान में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट आमने-सामने थे। मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा और आयोग ने 16 जनवरी 2017 को अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले समूह को समाजवादी पार्टी तथा ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल का अधिकार दिया।
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इस फैसले में संख्याबल महत्वपूर्ण रहा। आयोग के सामने अखिलेश गुट ने हलफनामों के जरिए 228 में से 205 विधायक, 68 में से 56 MLC, 24 में से 15 सांसद और 46 में से 28 राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्यों का समर्थन दिखाया था। राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों में भी बड़ी संख्या में समर्थन दर्ज कराया गया था। समकालीन रिपोर्टों में आयोग के आदेश का यही विवरण प्रकाशित हुआ था।
यहां एक जरूरी कानूनी बात समझना महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में आयोग केवल यह नहीं देखता कि कौन-सा नेता खुद को पार्टी का प्रमुख बता रहा है। Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावे की जांच की जा सकती है।
इस पूरी व्यवस्था की जड़ में ‘सादिक अली’ फैसला
इस प्रक्रिया की कानूनी पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट के Sadiq Ali v. Election Commission of India मामले में मिलती है। मामले का फैसला 11 नवंबर 1971 को हुआ था, हालांकि इसका प्रमुख कानूनी संदर्भ 1972 के रिपोर्टेड फैसले में मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो गुट एक ही पार्टी होने का दावा करें, तो चुनाव आयोग को उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर निर्णय करना पड़ सकता है। फैसले में बहुमत और संख्याबल को लोकतांत्रिक संगठन में महत्वपूर्ण कसौटी माना गया।
दिलचस्प बात यह है कि इसे केवल “विधायकों की गिनती” का फार्मूला समझना भी सही नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में पार्टी संविधान, संगठनात्मक स्थिति, पार्टी के उद्देश्य और विधायी समर्थन जैसे पहलुओं की जांच हुई है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड भी पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव चिन्ह विवाद में आयोग की भूमिका को मान्यता देते हैं।
शिवसेना और NCP में कैसे बदली तस्वीर?
शिवसेना विवाद में चुनाव आयोग ने पाया कि संगठनात्मक बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा निर्धारित करना संभव नहीं था, इसलिए उसने विधायी बहुमत पर भरोसा किया। आयोग के अनुसार एकनाथ शिंदे गुट के साथ 55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 सांसद थे। इसी आधार पर आयोग ने नाम और ‘धनुष-बाण’ चिन्ह को लेकर फैसला किया।
इसी तरह फरवरी 2024 में NCP विवाद में चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को NCP नाम और ‘घड़ी’ चिन्ह के उपयोग का अधिकार दिया। आयोग ने विभिन्न परीक्षणों पर विचार करने के बाद विधायी बहुमत को निर्णायक आधार बनाया।
अब TMC में असली पेच क्या है?
TMC मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी किसी गुट को अंतिम तौर पर पार्टी का नाम या चिन्ह नहीं मिला है। चुनाव आयोग ने पहले दोनों पक्षों को समान स्थिति में रखते हुए अंतरिम व्यवस्था बनाई है, क्योंकि आगामी उपचुनाव नजदीक हैं। अंतिम निर्धारण के दौरान संगठनात्मक दस्तावेज, पार्टी संरचना और दोनों पक्षों के समर्थन से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं।



