नेपाल बाढ़: 1,404 मौतें, 6,150 लोग अब भी लापता
काठमांडू। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के तीन सप्ताह बाद भी राहत और बचाव अभियान खत्म नहीं हुआ है। नेपाल पुलिस के ताजा बुलेटिन के अनुसार मृतकों की संख्या 1,404 हो गई है, जबकि करीब 6,150 लोग अब भी लापता हैं। अब तक 13,700 से अधिक लोगों को बचाया जा चुका है। कुछ रिपोर्टों में राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण के आंकड़े में मृतकों की संख्या 1,403 बताई गई है, इसलिए आंकड़ों में मामूली अंतर अपडेट के समय और स्रोत के कारण है।
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इस आपदा का सबसे कठिन हिस्सा अब सिर्फ बाढ़ का पानी नहीं, बल्कि उसके बाद बचा मलबा है। सीमा क्षेत्र में हुए बर्फ और चट्टानों के बड़े मलबे के खिसकने से पैदा हुई अचानक बाढ़ ने भोटेकोशी नदी के प्रवाह को बेहद हिंसक बना दिया। पानी और मलबे ने घरों, पुलों, सड़कों तथा जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया। कई इलाकों में संपर्क और आवाजाही बाधित होने से लापता लोगों तक पहुंचना बेहद मुश्किल है।
हजारों परिवारों के लिए राहत से बड़ा सवाल है पहचान
बाढ़ में बरामद शवों की पहचान प्रशासन के सामने अलग चुनौती बन गई है। पानी, कीचड़ और मलबे में लंबे समय तक रहने के कारण कई शवों की स्थिति ऐसी है कि पारंपरिक पहचान मुश्किल हो रही है। Reuters के मुताबिक, नेपाल में 1,206 अज्ञात शवों और 1,889 परिजनों के DNA नमूने लिए गए हैं, जबकि अब तक केवल 105 शवों की पहचान कर उन्हें परिवारों को सौंपा जा सका था।
इसका असर सिर्फ भावनात्मक नहीं है। किसी लापता व्यक्ति की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट न होने से परिवारों के सामने मृत्यु प्रमाणपत्र, बीमा, संपत्ति और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं। इसलिए DNA पहचान अभियान अब राहत कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
हाइड्रोपावर सुरंगों में तलाश ने बढ़ाई चुनौती
रसुवा और नुवाकोट की जलविद्युत परियोजनाएं इस आपदा की दूसरी बड़ी तस्वीर दिखाती हैं। कई कर्मचारी परियोजना परिसर और सुरंगों में फंस गए थे। चिलिमे हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग से पांच शव बरामद किए गए हैं। नेपाली और भारतीय विशेषज्ञों ने कई दिनों तक मलबा हटाने के बाद पावरहाउस तक पहुंच बनाई। दूसरी परियोजना के सुरंग क्षेत्र से भी पांच शव मिलने की सूचना दी गई।
जलविद्युत क्षेत्र को हुआ नुकसान नेपाल के लिए आर्थिक चुनौती भी है। देश की बिजली व्यवस्था में हाइड्रोपावर की बड़ी भूमिका है और बाढ़ के बाद भारत ने नेपाल की तत्काल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए 31 दिसंबर 2026 तक प्रतिदिन 18 घंटे, अधिकतम 654 मेगावाट बिजली निर्यात की अनुमति दी है।
अब आपदा प्रबंधन के साथ जलवायु जोखिम पर भी नजर
17 सितंबर को प्रकाशित वैज्ञानिक विश्लेषण ने इस आपदा को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। World Weather Attribution के अध्ययन के अनुसार हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पतले होने और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने ने ग्लेशियर और पर्वतीय ढलानों की अस्थिरता बढ़ाने में भूमिका निभाई हो सकती है। वैज्ञानिकों ने इसे केवल एक कारण नहीं बताया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन को जोखिम बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया है।
इसलिए नेपाल के लिए अगली चुनौती केवल टूटे पुल और बिजली परियोजनाएं दोबारा बनाना नहीं है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी घाटियों की जोखिम मैपिंग और संवेदनशील बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को मजबूत करना भी जरूरी होगा। मौजूदा त्रासदी यह दिखा रही है कि पहाड़ों में कुछ मिनटों में बदल जाने वाली परिस्थितियों के लिए सामान्य बाढ़-तैयारी पर्याप्त नहीं हो सकती।
फिलहाल हजारों परिवार अपने लापता परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं और बचाव टीमें मलबे, सुरंगों तथा दुर्गम पहाड़ी इलाकों में खोज जारी रखे हुए हैं। नेपाल के लिए यह अब सिर्फ एक बचाव अभियान नहीं, बल्कि लापता लोगों की पहचान, ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की आपदा तैयारी—तीनों को एक साथ संभालने की चुनौती बन चुका है।



