तमिलनाडु में नवोदय स्कूलों पर फिर गरमाया विवाद
नई दिल्ली। तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने है और इस बार बहस का केंद्र केवल स्कूल खोलने की जमीन नहीं, बल्कि भाषा नीति और केंद्र-राज्य संबंध भी बन गया है। 17 सितंबर 2026 को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने राज्य सरकार को दिसंबर 2025 के निर्देश का पालन करते हुए प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय के लिए उपयुक्त जमीन की पहचान करने को कहा। राज्य को इसके लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है।
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु की दो-भाषा नीति और नवोदय विद्यालयों में लागू तीन-भाषा व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु में हिंदी बिल्कुल नहीं पढ़ाई जाए। अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि चेन्नई और दिल्ली के बीच दूरी की भावना के बजाय सहकारी संघवाद के तहत बातचीत से मतभेद सुलझाए जाने चाहिए।
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विवाद की जड़ सिर्फ हिंदी नहीं है
तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि नवोदय योजना की मौजूदा तीन-भाषा व्यवस्था राज्य की वैधानिक दो-भाषा नीति से मेल नहीं खाती। मार्च 2026 में दायर अपने पक्ष में राज्य ने कहा था कि योजना को वर्तमान स्वरूप में लागू करने के लिए तमिलनाडु की मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बदलाव करना पड़ेगा। राज्य ने शिक्षा व्यवस्था की वित्तीय और प्रशासनिक चिंताओं को भी उठाया था।
दूसरी तरफ, केंद्र का कहना है कि नवोदय विद्यालयों में गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लिए स्थानीय भाषा या अंग्रेजी के इस्तेमाल की व्यवस्था मौजूद है। शिक्षा मंत्रालय के दस्तावेज के अनुसार नवोदय योजना में क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी और हिंदी को लेकर तीन-भाषा सूत्र अपनाया जाता है। यानी विवाद को केवल “हिंदी बनाम तमिल” के रूप में देखना पूरे मामले की जटिलता को छोटा कर देता है।
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जमीन की पहचान से आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा निर्देश तत्काल स्कूल निर्माण या जमीन अधिग्रहण का आदेश नहीं है। फिलहाल राज्य को प्रत्येक जिले में आवश्यक जमीन की पहचान करनी है और केंद्र के साथ बातचीत जारी रखनी है। दिसंबर 2025 में भी अदालत ने दोनों सरकारों को संयुक्त चर्चा करने और जमीन की आवश्यकता का आकलन करने को कहा था।
नवोदय विद्यालयों का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आवासीय और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। केंद्र के अनुसार ऐसे विद्यालयों के लिए राज्य सरकार को लगभग 30 एकड़ उपयुक्त जमीन नि:शुल्क और सभी प्रकार के भार से मुक्त उपलब्ध करानी होती है। इसलिए वास्तविक चुनौती सिर्फ राजनीतिक सहमति नहीं, बल्कि जमीन, प्रशासनिक व्यवस्था और भाषा-संबंधी शर्तों पर व्यावहारिक सहमति बनाना भी होगी।
आगे की सुनवाई 14 दिसंबर 2026 को होगी। तब तक केंद्र और राज्य के बीच बातचीत इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल अदालत ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि शिक्षा से जुड़े मतभेदों का समाधान टकराव के बजाय संवाद और संघीय सहयोग के रास्ते तलाशने से किया जाना चाहिए।



