Punjab Rail Roko
अमृतसर। पंजाब में किसान-मजदूर संगठनों और राज्य सरकार के बीच गतिरोध अब सड़कों से आगे बढ़कर रेलवे ट्रैक तक पहुंच गया है। किसान मजदूर मोर्चा (KMM) ने अपनी लंबित मांगों को लेकर रेल रोको आंदोलन शुरू किया है। इससे पहले संगठन ने सरकार को 17 सितंबर दोपहर 12 बजे तक ठोस समाधान निकालने का समय दिया था। तय समय तक पहल नहीं होने के बाद अमृतसर, गुरदासपुर, फिरोजपुर, मोगा और संगरूर-सुनाम सहित कई स्थानों पर रेल यातायात रोकने का कार्यक्रम सामने आया।
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मोगा में प्रदर्शन के दौरान किसानों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी। किसानों का आरोप है कि उन्हें रेलवे ट्रैक तक पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस बल और बैरिकेडिंग लगाई गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी ट्रैक तक पहुंच गए। ऐसे घटनाक्रम ने आंदोलन के शांतिपूर्ण धरनों से अधिक टकराव वाले चरण में पहुंचने की चिंता बढ़ा दी है।
आखिर किसान किन मुद्दों पर अड़े हैं?
इस आंदोलन की खास बात यह है कि मांगें केवल किसी एक फसल या खरीद व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। किसान संगठनों ने मूंग, मक्का और आलू समेत पांच फसलों पर MSP की कानूनी गारंटी, बिजली संशोधन अधिनियम और बीज संशोधन अधिनियम से जुड़े सवालों पर स्पष्टीकरण तथा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संभावित प्रभावों पर सरकार का रुख स्पष्ट करने की मांग रखी है।
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इसके अलावा शंभू-खनौरी आंदोलन के दौरान हुए कथित नुकसान और किसानों के घायल होने के मामलों में मुआवजे की मांग भी आंदोलन का हिस्सा है। संगठन का दावा है कि उस दौरान करीब 3.77 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और सैकड़ों किसान घायल हुए। इन आंकड़ों को संगठन के दावे के रूप में देखना जरूरी है; स्वतंत्र सरकारी सत्यापन की जानकारी इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।
सरकार पर बातचीत शुरू करने का दबाव
किसान नेताओं का कहना है कि उन्होंने पहले मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर बातचीत की मांग की थी। 31 अगस्त को डिप्टी कमिश्नर कार्यालयों के बाहर भी प्रदर्शन किए गए और इसके बाद मंत्रियों के आवासों के बाहर धरने शुरू हुए। 17 सितंबर से पहले संगठन ने नौ मंत्रियों के आवासों के बाहर प्रदर्शन किए जाने की बात कही थी।
अब रेलवे ट्रैक को आंदोलन का केंद्र बनाने का फैसला सरकार पर बातचीत के लिए दबाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, रेल परिचालन बाधित होने से आम यात्रियों, माल परिवहन और राज्य से गुजरने वाली रेल सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है।
अगला कदम 18 सितंबर को तय होगा
मोर्चे ने संकेत दिया है कि 18 सितंबर को अगली बैठक में सरकार की प्रतिक्रिया की समीक्षा की जाएगी। यदि बातचीत या ठोस निर्णय की दिशा में प्रगति नहीं होती है तो आंदोलन का दायरा बढ़ाने पर फैसला लिया जा सकता है।
यही वजह है कि पंजाब सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ किसानों और मजदूरों की मांगों पर राजनीतिक एवं प्रशासनिक संवाद बनाए रखना, दूसरी तरफ रेल यातायात और कानून-व्यवस्था को प्रभावित होने से रोकना।



