INDIA Alliance Crisis
नई दिल्ली। विपक्षी दलों ने 2023 में जब INDIA गठबंधन बनाया था, तब मकसद सिर्फ अलग-अलग पार्टियों को एक मंच पर लाना नहीं था। लक्ष्य था—लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने एक ऐसा संयुक्त राजनीतिक विकल्प खड़ा करना, जिसमें क्षेत्रीय दल अपनी ताकत और कांग्रेस अपना राष्ट्रीय आधार साथ लेकर चलें। तीन साल बाद तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है।
गठबंधन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी अब चुनावी सीटों से ज्यादा आपसी समन्वय बन गई है। 2023 में बनाई गई 14 सदस्यीय समन्वय समिति की पहली बैठक 13 सितंबर को हुई थी और उसके बाद उसका कोई नियमित राष्ट्रीय तंत्र विकसित नहीं हो सका।
जून 2026 में विपक्षी दलों ने फिर से राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने की कोशिश की। 8 जून की बैठक में 25 दलों की मौजूदगी बताई गई और हर दो महीने में बैठक करने का फैसला हुआ। अगस्त में हैदराबाद में अगली बैठक की घोषणा भी की गई थी। लेकिन सितंबर की शुरुआत तक अगली बैठक की तारीख को लेकर स्पष्टता नहीं बन पाई थी।
यही स्थिति सवाल खड़ा करती है—क्या INDIA गठबंधन चुनाव के समय सीटों का समझौता करने वाला मंच भर रह गया है, या वह वास्तव में एक लंबे समय तक चलने वाला राजनीतिक गठबंधन बन सकता है?
2024 में मिली सफलता ने क्या दिखाया?
INDIA गठबंधन के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव यह साबित करने वाला मौका था कि अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दल सीटों के स्तर पर तालमेल करके भाजपा को चुनौती दे सकते हैं।
गठबंधन के दलों ने मिलकर 234 लोकसभा सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के तालमेल ने 80 में से 43 सीटें हासिल कीं, जबकि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन ने 48 में से 30 सीटें जीतीं।
इन नतीजों से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक सामने आया—जहां स्थानीय समीकरण, उम्मीदवारों का चयन और सीट बंटवारा व्यावहारिक तरीके से हुआ, वहां विपक्ष मजबूत दिखाई दिया।
लेकिन यही मॉडल हर राज्य में दोहराया नहीं जा सका।
पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों में गठबंधन के घटक दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इसका मतलब यह था कि राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ दिखने वाले दल कई राज्यों में सीधे एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी बने रहे।
यहीं से INDIA गठबंधन की मूल समस्या सामने आती है।
समस्या सीट बंटवारे से ज्यादा ‘एक-दूसरे पर भरोसे’ की है
किसी भी चुनावी गठबंधन में सीटों का बंटवारा सिर्फ गणित नहीं होता। इसके पीछे यह सवाल भी होता है कि कौन-सी पार्टी किस राज्य में कितनी राजनीतिक जगह छोड़ेगी और बदले में उसे क्या मिलेगा।
कांग्रेस के लिए गठबंधन का मतलब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेतृत्व को मजबूत करना है। दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों की प्राथमिकता अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक प्रभाव और संगठन को बचाए रखना है।
यही अंतर कई बार टकराव पैदा करता है।
उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों का तालमेल सफल रहा। लेकिन विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर हिस्सेदारी तय करना कहीं अधिक जटिल होगा। हर विधानसभा सीट पर स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की लोकप्रियता, जातीय समीकरण और पिछले चुनाव का प्रदर्शन जैसे मुद्दे सामने आएंगे।
इसलिए लोकसभा का सफल गठबंधन अपने आप विधानसभा में सफल हो जाए, यह जरूरी नहीं है।
जून 2026 की बैठक ने उम्मीद जगाई, लेकिन चुनौती वहीं रही
2026 में लंबे अंतराल के बाद विपक्षी दलों की राष्ट्रीय स्तर पर बैठक हुई। 8 जून को हुई बैठक में नेताओं ने राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने और गठबंधन की बैठकों को नियमित करने का फैसला किया। मल्लिकार्जुन खरगे ने घोषणा की थी कि सहयोगी दल हर दो महीने में बैठक करेंगे और अगली बैठक हैदराबाद में होगी।
बैठक में SIR, चुनावी प्रक्रिया, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों और अन्य मुद्दों पर संयुक्त राजनीतिक रुख बनाने की कोशिश भी हुई।
लेकिन गठबंधन की असली परीक्षा बैठक बुलाने से नहीं, बैठक के फैसलों को लगातार लागू करने से होगी।
यही वह जगह है जहां 2023 के अनुभव से तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है।
तीन साल पहले भी समन्वय समिति बनाई गई थी। वह गठबंधन का शीर्ष निर्णय लेने वाला मंच माना गया था, लेकिन उसकी पहली बैठक के बाद नियमित संस्थागत ढांचा विकसित नहीं हो सका।
राज्यों में अलग-अलग राजनीति ने राष्ट्रीय एकता को मुश्किल बनाया
INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि इसके सहयोगी दल एक ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ हर जगह एक साथ नहीं लड़ते।
केरल में कांग्रेस और वाम दल एक-दूसरे के सामने हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच अलग राजनीतिक समीकरण हैं। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच प्रतिस्पर्धा रही है। तमिलनाडु की राजनीति में भी गठबंधन समीकरण लगातार बदलते रहे हैं।
इसका अर्थ यह है कि दिल्ली में बैठकर बनाई गई कोई एक राष्ट्रीय रणनीति हर राज्य पर लागू नहीं हो सकती।
INDIA गठबंधन को शायद एक केंद्रीय कमांड मॉडल के बजाय ‘राष्ट्रीय न्यूनतम एजेंडा + राज्यवार स्वतंत्र रणनीति’ के मॉडल की जरूरत है।
यानी राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा नीति हो, लेकिन राज्यों में सीट और नेतृत्व संबंधी फैसले स्थानीय सहयोगियों की वास्तविक ताकत के आधार पर हों।
तमिलनाडु का घटनाक्रम बड़ी चेतावनी क्यों है?
तमिलनाडु का हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इस चुनौती को और स्पष्ट करता है। 2026 में कांग्रेस का राजनीतिक समीकरण द्रमुक से अलग दिशा में गया और उसने टीवीके के नेतृत्व वाले मोर्चे के साथ गठजोड़ किया। सितंबर 2026 में इस नए गठबंधन को ‘Secular Social Justice Victory Alliance’ नाम दिया गया।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान INDIA खेमे का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा था। राज्य की सभी 39 लोकसभा सीटें INDIA खेमे के खाते में गई थीं।
लेकिन लोकसभा में साथ काम करना और विधानसभा चुनाव में सत्ता के समीकरण तय करना अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियां हैं।
यही INDIA मॉडल की बुनियादी चुनौती है—एक चुनाव में सफल साझेदारी अगले चुनाव की गारंटी नहीं बनती।
2027 के विधानसभा चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा बन सकते हैं
आने वाले विधानसभा चुनावों में गठबंधन के सामने कई ऐसे राज्य होंगे जहां सहयोगी दलों के हित सीधे टकराते हैं।
खास तौर पर उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा हो सकता है। यहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच लोकसभा चुनाव का तालमेल सफल रहा था। लेकिन विधानसभा की 403 सीटों पर समझौता करना दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से ज्यादा कठिन होगा।
अगर सीट बंटवारे में देरी होती है, उम्मीदवारों की घोषणा अलग-अलग होती है या सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर हमला करते हैं, तो 2024 में बनी संयुक्त विपक्षी धार कमजोर पड़ सकती है।
इसके उलट अगर दोनों दल समय रहते सीटों, साझा अभियान और मुख्यमंत्री पद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट समझौता कर लेते हैं, तो गठबंधन की विश्वसनीयता फिर मजबूत हो सकती है।
क्या INDIA गठबंधन को नई समन्वय समिति की जरूरत है?
सिर्फ एक और बैठक बुलाना शायद पर्याप्त नहीं होगा।
गठबंधन को तीन स्तरों पर स्थायी व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है:
पहला—राष्ट्रीय समन्वय तंत्र:
हर सहयोगी दल के प्रतिनिधियों वाली ऐसी समिति, जो नियमित रूप से बैठक करे और विवादों पर तत्काल बातचीत कर सके।
दूसरा—राज्यवार समन्वय समूह:
जहां दो या उससे अधिक सहयोगी चुनावी रूप से साथ हैं, वहां स्थानीय नेताओं को सीट बंटवारे और साझा कार्यक्रम पर काम करने की जिम्मेदारी दी जाए।
तीसरा—साझा न्यूनतम राजनीतिक एजेंडा:
हर चुनाव में नया मुद्दा तलाशने के बजाय संविधान, संघीय ढांचे, आर्थिक मुद्दों, सामाजिक कल्याण और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े कुछ स्पष्ट मुद्दों पर लगातार संयुक्त अभियान चलाया जाए।
इससे गठबंधन केवल चुनावी गणित न रहकर राजनीतिक पहचान भी बना सकता है।
फिर भी गठबंधन पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है
INDIA गठबंधन को पूरी तरह समाप्त मानना भी सही नहीं होगा। जून की बैठक में कई दल एक साथ आए और संसद में विपक्षी दल विभिन्न मुद्दों पर समन्वय करते रहे हैं। यानी राजनीतिक सहयोग की जरूरत अभी भी मौजूद है, लेकिन उसका संस्थागत ढांचा कमजोर है।
यही फर्क महत्वपूर्ण है।
किसी गठबंधन की ताकत सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने नेता एक मंच पर खड़े होते हैं। असली ताकत तब दिखती है जब दो सहयोगी दलों के बीच सीट को लेकर विवाद हो और फिर भी वे एक साझा रणनीति पर पहुंच जाएं।
आगे क्या होगा?
INDIA गठबंधन के सामने अब दो रास्ते हैं।
पहला रास्ता यह है कि दल राज्यवार समझौते करते रहें और राष्ट्रीय स्तर पर केवल महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक साथ आएं। यह मॉडल अल्पकालिक रूप से व्यावहारिक हो सकता है, लेकिन इसमें चुनाव-दर-चुनाव अनिश्चितता बनी रहेगी।
दूसरा रास्ता एक अधिक व्यवस्थित गठबंधन ढांचा तैयार करना है, जिसमें नियमित बैठकें, विवाद निपटाने की व्यवस्था, साझा एजेंडा और चुनाव से काफी पहले सीट बंटवारे की प्रक्रिया तय हो।
2024 ने विपक्ष को दिखाया कि एकजुट होकर लड़ने पर भाजपा के मजबूत राज्यों में भी मुकाबला बदला जा सकता है। लेकिन उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम यह भी बताते हैं कि केवल चुनावी जरूरत के समय एक साथ आना पर्याप्त नहीं है।
अमेरिका डॉलर से अरबों कैसे कमाता है? दुनिया में डॉलर की ताकत और BRICS की चुनौती समझिए
http://Facebook Group: https://www.facebook.com/share/18vehRxYq6/?mibextid=wwXIfr



