देश की राजनीति में मुफ्त योजनाओं और चुनावी वादों पर बहस तेज हो गई है। कई राज्यों में नई सरकारें आठ ग्राम सोना, मुफ्त साड़ी और बड़ी संख्या में नौकरियां देने जैसे वादों के साथ सत्ता में आई हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जर्जर सरकारी खजाने और बढ़ती उधारी के बीच इन योजनाओं को लागू करने के लिए पैसा कहां से आएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से ही दबाव में है और ऐसे वादे राजकोषीय संतुलन को और कमजोर कर सकते हैं।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, कई राज्यों का कर्ज लगातार बढ़ रहा है और राजस्व का बड़ा हिस्सा पहले ही वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है। ऐसे में नई योजनाओं के लिए या तो कर बढ़ाने होंगे या फिर और कर्ज लेना पड़ेगा। इससे भविष्य में विकास परियोजनाओं पर खर्च कम होने का खतरा भी बढ़ सकता है।
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हालांकि सरकारों का तर्क है कि ये योजनाएं सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक समानता के लिए जरूरी हैं। उनका कहना है कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग को सीधा फायदा मिलेगा और अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वित्तीय अनुशासन नहीं रखा गया तो आने वाले वर्षों में राज्यों की अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।


