पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध जैसे हालातों ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। इस क्षेत्र में तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई और चालू खाता घाटा दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबी खिंचती है तो पेट्रोल-डीजल के दामों में भी असर दिखाई दे सकता है।
शेयर बाजार पर भी इसका तात्कालिक प्रभाव पड़ता है। अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं, जिससे इक्विटी बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ जाता है। आईटी, ऑटो और एविएशन जैसे सेक्टर पर तेल कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव पड़ सकता है, जबकि रक्षा और ऊर्जा कंपनियों में हलचल देखी जा सकती है। रुपये पर भी दबाव बनने की आशंका रहती है, जिससे आयात महंगा हो सकता है।
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वैश्विक स्तर पर भी अमेरिका, यूरोप और एशियाई बाजारों में अस्थिरता देखी जा सकती है। सोना जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में तेजी आने की संभावना रहती है। ऐसे समय में निवेशकों को सतर्क रणनीति अपनाने और दीर्घकालिक नजरिया बनाए रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।


