दुनियाभर में एक बार फिर छंटनी की बड़ी लहर देखने को मिल रही है। मीडिया से लेकर टेक्नोलॉजी, ई-कॉमर्स और स्टार्टअप सेक्टर तक हजारों कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं। अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई बड़े कॉरपोरेट हाउस लागत घटाने और मुनाफा बढ़ाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वर्कफोर्स कम कर रहे हैं, जिससे ग्लोबल जॉब मार्केट में अनिश्चितता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजहें आर्थिक मंदी की आशंका, ऊंची ब्याज दरें, विज्ञापन राजस्व में गिरावट और एआई व ऑटोमेशन का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल हैं। टेक कंपनियां खास तौर पर यह तर्क दे रही हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेटेड सिस्टम की वजह से पहले जितने कर्मचारियों की जरूरत थी, अब उतनी नहीं रही। वहीं मीडिया कंपनियां डिजिटल ट्रांजिशन और घटती कमाई से जूझ रही हैं।
भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका असर दिख रहा है। भले ही कंपनियां इसे “री-स्ट्रक्चरिंग” या “एफिशिएंसी ड्राइव” कह रही हों, लेकिन कर्मचारियों के लिए यह दौर चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में स्किल अपग्रेडेशन और नई तकनीकों के साथ खुद को ढालना ही नौकरियों को सुरक्षित रखने का सबसे बड़ा तरीका होगा।


