8वें वेतन आयोग पर बड़ी मांग: DA मर्जर और फिटमेंट फैक्टर बदलने से बढ़ सकती है सैलरी-पेंशन
नई दिल्ली। केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए अगला वेतन संशोधन केवल बेसिक सैलरी बढ़ने का मामला नहीं है। महंगाई के बीच वास्तविक आमदनी कितनी बढ़ेगी, पेंशन की गणना किस आधार पर होगी और महंगाई भत्ते (DA) को मूल वेतन में शामिल करने का कोई स्थायी नियम बनेगा या नहीं—ये ऐसे सवाल हैं जिन पर कर्मचारी संगठन जोर दे रहे हैं।
बेंगलुरु में हुई बैठक के दौरान संगठनों ने वेतन संरचना में बदलाव, फिटमेंट फैक्टर की समीक्षा और DA के मर्जर को लेकर सुझाव रखे। अब इन मांगों पर चर्चा की अगली अहम कड़ी 22 और 23 अक्टूबर को मुंबई में प्रस्तावित बैठक होगी। हालांकि, इन सुझावों को अभी सरकार की मंजूरी या लागू होने वाले नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फिटमेंट फैक्टर पर अलग-अलग संगठनों की अलग मांग
फिटमेंट फैक्टर वह गुणक है, जिसका इस्तेमाल वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत मौजूदा मूल वेतन को संशोधित करने के लिए किया जा सकता है। इसका स्तर तय होने पर नए बेसिक पे की गणना पर सीधा असर पड़ता है। लेकिन अंतिम वेतन वृद्धि केवल इसी आंकड़े से तय नहीं होती; वेतन मैट्रिक्स, भत्तों और आयोग की दूसरी सिफारिशों की भी भूमिका होती है।
कर्मचारी संगठनों ने इस बार अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर की मांग की है:
- नेशनल काउंसिल-JCM के स्टाफ साइड ने 3.833 फिटमेंट फैक्टर की मांग रखी है। इसके प्रस्ताव में मौजूदा न्यूनतम बेसिक पे 18,000 रुपये से बढ़ाकर 69,000 रुपये करने की बात कही गई है।
- भारत पेंशनर्स समाज ने भी 3.83 फिटमेंट फैक्टर की मांग की है।
- मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन, सर्वे ऑफ इंडिया ने 3.61 फिटमेंट फैक्टर का सुझाव दिया है।
ये संगठनात्मक मांगें हैं, अंतिम रूप से तय वेतनमान नहीं। आयोग सभी प्रस्तावों पर विचार करने के बाद अपनी सिफारिशें तैयार करेगा और उसके बाद सरकार का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।
कर्मचारियों के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि अभी प्रस्तावित गुणकों के आधार पर भविष्य की सैलरी को पक्का मानकर वित्तीय योजना बनाना जल्दबाजी होगी।
50% DA पर फिटमेंट फैक्टर की समीक्षा क्यों चाहते हैं कर्मचारी?
फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन ने सुझाव दिया है कि जब DA और पेंशनर्स के लिए महंगाई राहत (DR) 50 प्रतिशत तक पहुंचे, तो फिटमेंट फैक्टर की समीक्षा की जाए। संगठन ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि DA 25 प्रतिशत के स्तर को पार करने पर उसे मूल वेतन में मर्ज करने की व्यवस्था हो।
इस मांग के पीछे मूल तर्क यह है कि महंगाई बढ़ने के साथ कर्मचारियों के खर्च भी बढ़ते हैं। यदि वेतन संशोधन के बीच लंबा अंतर हो, तो समय के साथ मूल वेतन और वास्तविक खरीद क्षमता के बीच दबाव पैदा हो सकता है।
हालांकि, DA का मूल वेतन में मर्जर अपने आप में अतिरिक्त वेतन वृद्धि के बराबर नहीं होता। इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि मर्जर के बाद वेतन और भत्तों की गणना कैसे की जाती है तथा भविष्य में DA किस आधार पर तय होता है। इसलिए किसी प्रस्ताव के फायदे समझने के लिए उसके पूरे वेतन ढांचे को देखना जरूरी है।
25% DA पर मर्जर का प्रस्ताव पेंशनर्स के लिए भी अहम
भारत पेंशनर्स समाज ने 25 प्रतिशत DR होने पर उसे मूल पेंशन में मर्ज करने की मांग की है। पेंशनर्स के लिए यह मुद्दा खास महत्व रखता है, क्योंकि नियमित पेंशन ही उनकी मासिक आय का प्रमुख आधार होती है।
महंगाई का असर वरिष्ठ नागरिकों के घरेलू बजट पर भोजन, दवाइयों, आवास और दूसरी जरूरी सेवाओं के खर्च के जरिए पड़ता है। इसलिए पेंशन में संशोधन का ढांचा ऐसा होना चाहिए जो समय के साथ खरीद क्षमता बनाए रखने में मदद करे।
लेकिन यहां भी यह स्पष्ट रहना चाहिए कि DR को मूल पेंशन में शामिल करने का सुझाव अभी स्वीकृत व्यवस्था नहीं है। अंतिम लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और आयोग ऐसी किसी व्यवस्था को स्वीकार करते हैं या नहीं और उसके लिए क्या शर्तें निर्धारित की जाती हैं।
DA 60% होने का क्या मतलब है?
दिए गए विवरण के अनुसार, केंद्रीय कर्मचारियों को फिलहाल 60 प्रतिशत DA मिल रहा है। कर्मचारी संगठनों ने DA में समय के साथ हुई बढ़ोतरी को वेतन संरचना की समीक्षा के पक्ष में एक आधार के रूप में पेश किया है।
DA का उद्देश्य महंगाई के असर की भरपाई करना है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि कर्मचारियों की वास्तविक क्रय शक्ति भी उसी अनुपात में बढ़ गई है। वास्तविक स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि भोजन, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे खर्च कितनी तेजी से बढ़े हैं।
इसीलिए फिटमेंट फैक्टर और DA मर्जर पर चर्चा में केवल प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना होगा कि संशोधित वेतन से कर्मचारियों की वास्तविक आय में कितना सुधार होगा और पेंशनर्स की जरूरतों को किस तरह संबोधित किया जाएगा।
8वें वेतन आयोग की रिपोर्ट कब आएगी?
आयोग का गठन नवंबर 2025 में किए जाने की जानकारी दी गई है और उसे अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है। आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही आगे वेतन संशोधन को लेकर सरकारी निर्णय की प्रक्रिया बढ़ेगी।
इस दौरान कर्मचारी संगठनों की मांगें, विभिन्न पक्षों के सुझाव और वित्तीय प्रभावों का आकलन महत्वपूर्ण होंगे। मुंबई में 22 और 23 अक्टूबर को प्रस्तावित बैठक से भी इन मुद्दों पर चर्चा आगे बढ़ सकती है, लेकिन बैठक होना किसी मांग के स्वीकार होने की गारंटी नहीं है।
कर्मचारियों और पेंशनर्स को फिलहाल तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए: फिटमेंट फैक्टर पर अंतिम सिफारिश क्या होती है, DA या DR मर्जर को लेकर कोई औपचारिक निर्णय आता है या नहीं, और सरकार संशोधित वेतन संरचना के लागू होने की तारीख तथा शर्तें क्या तय करती है।
कर्मचारियों को अभी क्या करना चाहिए?
जब तक आधिकारिक निर्णय नहीं आता, तब तक प्रस्तावित फिटमेंट फैक्टर के आधार पर संभावित वेतन वृद्धि को निश्चित आय न मानें। बड़े कर्ज, घर खरीदने या अन्य दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धताओं का फैसला मौजूदा आय और वास्तविक भुगतान क्षमता को ध्यान में रखकर करना अधिक सुरक्षित होगा।
इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कर्मचारी संगठन केवल बेसिक वेतन बढ़ाने की मांग नहीं कर रहे, बल्कि महंगाई के अनुरूप वेतन और पेंशन की समीक्षा के लिए अधिक स्पष्ट व्यवस्था चाहते हैं। अब देखना होगा कि आयोग इन मांगों को अपनी सिफारिशों में किस तरह जगह देता है और सरकार उनमें से किन प्रस्तावों को स्वीकार करती है।



