करीब 150 साल पहले रचित ‘वंदे मातरम’ आज भी भारत के सार्वजनिक विमर्श का अहम हिस्सा बना हुआ है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया यह गीत सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई में राष्ट्रवाद की आवाज बना। इसके बावजूद, डेढ़ सदी बाद भी ‘वंदे मातरम’ को लेकर बहस थमी नहीं है। सवाल उठता है—आखिर क्यों यह मुद्दा आज भी उतना ही प्रासंगिक है?‘वंदे मातरम’ ने ब्रिटिश शासन के दौर में देशवासियों को एक सूत्र में बांधा। यह नारा आंदोलनों, सभाओं और बलिदानों का प्रतीक बना। आज़ादी के बाद इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला, जो भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
समय के साथ ‘वंदे मातरम’ को लेकर कुछ वर्गों में वैचारिक और सांस्कृतिक असहजता देखी गई। कोई इसे धार्मिक प्रतीकों से जोड़ता है, तो कोई राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति को संकीर्ण नजरिये से देखता है। यही कारण है कि यह गीत केवल देशभक्ति का प्रतीक न रहकर, विचारधाराओं की टकराहट का मुद्दा भी बन गया है।लोकतंत्र में असहमति की जगह होती है, लेकिन राष्ट्र के प्रतीकों को समझना और उनका सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। ‘वंदे मातरम’ पर बहस यह दिखाती है कि राष्ट्रवाद को लेकर समाज में अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। इन दृष्टिकोणों को समझे बिना संवाद संभव नहीं।
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आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब ‘वंदे मातरम’ जैसी रचनाएं राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का स्रोत बनती हैं। यह बहस हमें याद दिलाती है कि राष्ट्रवाद केवल नारे नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संवेदना और जिम्मेदारी का बोध है।


