तेजस को बड़ा झटका! मलेशिया ने चुना दक्षिण कोरिया का FA-50M, जानिए भारत क्यों पिछड़ा
भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अहम चुनौती का सामना करना पड़ा, जब मलेशिया ने अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण के लिए दक्षिण कोरिया के FA-50 विमान को चुना। यह फैसला केवल दो विमानों की तकनीकी तुलना तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने रक्षा निर्यात में अनुभव, समय पर डिलीवरी, परिचालन विश्वसनीयता और विदेशी कंपनियों के सहयोग की अहमियत भी उजागर की।
मलेशिया ने मई 2023 में दक्षिण कोरिया की कोरिया एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (KAI) के साथ 18 FA-50M विमानों की खरीद के लिए लगभग 920 मिलियन डॉलर का समझौता किया था। भारतीय विमान निर्माता हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर था, क्योंकि तेजस को विदेशी बाजार में स्थापित करने के लिहाज से यह सौदा बड़ा साबित हो सकता था।
हालांकि, इस नतीजे को केवल भारत की हार या किसी विदेशी कंपनी की साजिश के रूप में देखना सही नहीं होगा। रक्षा खरीद में विमान की क्षमता के साथ-साथ उसकी उपलब्धता, पहले से मौजूद परिचालन अनुभव और दीर्घकालिक रखरखाव व्यवस्था भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
मलेशिया ने तेजस के बजाय FA-50M को क्यों चुना?
मलेशिया अपनी वायुसेना को आधुनिक बनाने और पुराने विमानों पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहा था। इसके लिए उसे ऐसा विमान चाहिए था, जो प्रशिक्षण और हल्के लड़ाकू अभियानों की जरूरतों को पूरा कर सके।
इस प्रतिस्पर्धा में तेजस और FA-50 अंतिम चरण तक पहुंचे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दक्षिण कोरियाई विमान के चयन में उसके परिचालन अनुभव और पहले से स्थापित निर्यात बाजार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
FA-50 परिवार के विमान फिलीपींस, थाईलैंड और अन्य देशों की वायुसेनाओं में सेवा दे चुके हैं। फिलीपींस ने अपने FA-50 विमानों का इस्तेमाल मारावी अभियान के दौरान भी किया था। इससे संभावित खरीदारों को विमान के परिचालन इस्तेमाल का व्यावहारिक अनुभव देखने का अवसर मिला।
इसके विपरीत, तेजस के पास उस समय विदेशी वायुसेना को विमान निर्यात करने का स्थापित रिकॉर्ड नहीं था। किसी नए विमान के लिए यह कमी प्रतिस्पर्धी निविदाओं में चुनौती बन सकती है, भले ही उसके तकनीकी गुण आकर्षक हों।
क्या तेजस तकनीकी रूप से कमजोर था?
मलेशिया के फैसले से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि तेजस तकनीकी रूप से कमजोर विमान है। किसी निविदा में चयन कई मानकों पर निर्भर करता है और प्रत्येक देश की सैन्य जरूरतें अलग होती हैं।
तेजस भारत में विकसित हल्का लड़ाकू विमान है, जिसे वायुसेना की आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया गया है। इसके अलग-अलग संस्करणों की क्षमताएं, उपकरण और परिचालन भूमिकाएं एक जैसी नहीं हैं। इसी तरह FA-50 परिवार भी प्रशिक्षण और हल्के लड़ाकू अभियानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।
मलेशिया के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कौन-सा विमान बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। उसे यह भी देखना था कि विमान कितनी जल्दी उपलब्ध होगा, उसके रखरखाव की व्यवस्था कैसी होगी और उसे मौजूदा सैन्य ढांचे में शामिल करने में कितना समय लगेगा।
इसलिए किसी एक सौदे के परिणाम को दोनों विमानों की समग्र गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण मानना भ्रामक होगा।
FA-50 को अमेरिकी सहयोग का कितना फायदा मिला?
दक्षिण कोरिया के विमान कार्यक्रम को अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन के साथ तकनीकी सहयोग से लाभ मिला। T-50 उन्नत जेट ट्रेनर कार्यक्रम को दक्षिण कोरिया और लॉकहीड मार्टिन ने मिलकर विकसित किया था। इसी विमान परिवार से TA-50 और FA-50 जैसे संस्करण सामने आए।
FA-50 कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थापित करने के लिए विमान के विकास अनुभव, उपलब्ध तकनीकी सहायता और निर्यात प्रयासों का फायदा मिला। अमेरिकी एयरोस्पेस उद्योग से जुड़े सहयोग ने भी इस विमान परिवार की अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने में भूमिका निभाई।
हालांकि, केवल अमेरिकी सहयोग को मलेशिया के फैसले का एकमात्र कारण बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। विमान का परिचालन अनुभव, कीमत, आपूर्ति कार्यक्रम, हथियार प्रणाली और रखरखाव की व्यवस्था जैसे कारक भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
रक्षा सौदों में किसी विमान की तकनीकी क्षमता के अलावा उसे लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने की क्षमता भी खरीदार के लिए बड़ी प्राथमिकता होती है।
भारत के रक्षा निर्यात के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
तेजस के मामले से भारत के रक्षा उद्योग के सामने एक अहम सवाल उभरता है: क्या स्वदेशी तकनीक विकसित करना ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफलता के लिए पर्याप्त है?
इसका जवाब है—नहीं। विमान विकसित करना एक बड़ा कदम है, लेकिन उसे विदेशी ग्राहक को बेचना और दशकों तक उसकी सहायता उपलब्ध कराना अलग चुनौती है।
अंतरराष्ट्रीय खरीदार आम तौर पर इन पहलुओं का आकलन करते हैं:
- परिचालन विश्वसनीयता: विमान ने वास्तविक परिस्थितियों में कैसा प्रदर्शन किया है?
- समय पर डिलीवरी: निर्माता निर्धारित समय पर कितने विमान उपलब्ध करा सकता है?
- रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स: विमान को लंबे समय तक सेवा में रखने के लिए कितनी मजबूत व्यवस्था है?
- हथियार और तकनीकी एकीकरण: क्या विमान खरीदार की मौजूदा प्रणालियों के साथ काम कर सकता है?
- वित्तीय शर्तें: खरीद, प्रशिक्षण और रखरखाव सहित पूरी परियोजना की लागत कितनी होगी?
तेजस के निर्यात के लिए इन सभी क्षेत्रों में भरोसा बनाना महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से, संभावित ग्राहकों को स्पष्ट उत्पादन कार्यक्रम, प्रशिक्षण व्यवस्था और दीर्घकालिक तकनीकी सहायता की पेशकश करना भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को मजबूत कर सकता है।
HAL के लिए मलेशिया का सौदा क्यों था अहम?
HAL के लिए यह अनुबंध सिर्फ 18 विमानों की बिक्री का अवसर नहीं था। यह तेजस को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थापित करने और दूसरे देशों के सामने उसकी उपयोगिता का उदाहरण पेश करने का मौका भी था।
पहला बड़ा निर्यात अनुबंध मिलने से किसी विमान कार्यक्रम की वैश्विक विश्वसनीयता को बल मिल सकता है। इसके बाद अन्य देश भी विमान के परिचालन अनुभव, उपलब्धता और रखरखाव के रिकॉर्ड का आकलन कर सकते हैं।
मलेशिया का फैसला भारत के लिए इस दिशा में चुनौती जरूर था, लेकिन इससे तेजस की भविष्य की निर्यात संभावनाएं अपने आप समाप्त नहीं हो जातीं। अन्य देशों की जरूरतें, बजट और सैन्य प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।
भारत को अब ऐसे बाजारों पर ध्यान देना होगा जहां तेजस की परिचालन भूमिका और लागत खरीदार की जरूरतों के अनुरूप हों। इसके साथ उत्पादन क्षमता और डिलीवरी की समयसीमा को लेकर भरोसेमंद योजना प्रस्तुत करना भी जरूरी होगा।
आगे क्या: तेजस के लिए निर्यात की राह कैसे मजबूत होगी?
भारत के लिए सबसे उपयोगी सबक यह है कि रक्षा निर्यात को केवल विमान की खूबियों के प्रचार तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए उत्पादन, प्रशिक्षण, रखरखाव, हथियारों की उपलब्धता और तकनीकी सहयोग को एक साथ पेश करना होगा।
यदि HAL और संबंधित संस्थाएं संभावित खरीदारों को स्पष्ट डिलीवरी समयसीमा, मजबूत सेवा नेटवर्क और प्रतिस्पर्धी वित्तीय शर्तें उपलब्ध कराती हैं, तो तेजस के लिए नए बाजारों में अवसर पैदा हो सकते हैं।
मलेशिया का फैसला भारत के स्वदेशी विमान कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव है। यह बताता है कि रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक बाजार में व्यावसायिक सफलता दो अलग-अलग लक्ष्य हैं। तेजस की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपनी तकनीकी क्षमता को विदेशी ग्राहकों के लिए भरोसेमंद और व्यावहारिक विकल्प में कितनी प्रभावी तरह बदल पाता है।



