Sengol News: ऐतिहासिक सेंगोल बनाने वाले एथिराज का निधन, 99 साल की उम्र में विदाई; 71 साल तक छिपा रहा परिवार का गौरव
भारत की आजादी से जुड़ी एक ऐतिहासिक धरोहर को अपने हाथों से आकार देने वाले कारीगर वुम्मिडी एथिराज अब इस दुनिया में नहीं रहे। चेन्नई में 99 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। एथिराज उन कारीगरों में शामिल थे, जिन्होंने 1947 में देश की स्वतंत्रता के समय जवाहरलाल नेहरू को सौंपे गए सेंगोल को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दशकों तक यह राजदंड संग्रहालय में एक सुनहरी छड़ी के रूप में दर्ज रहा और इसे बनाने वाले परिवार को भी लंबे समय तक इसकी ऐतिहासिक पहचान की जानकारी नहीं थी।
एथिराज की कहानी सिर्फ एक प्रसिद्ध धरोहर के निर्माता की नहीं है। यह उन अनगिनत कारीगरों की कहानी भी है, जिनकी मेहनत इतिहास का हिस्सा बन जाती है, लेकिन जिनके नाम और योगदान को पहचान मिलने में कई दशक लग जाते हैं।
1947 में तैयार हुआ सेंगोल, लेकिन कारीगर की पहचान पीछे छूट गई
भारत की स्वतंत्रता के समय सेंगोल तैयार करने का काम चेन्नई के वुम्मिडी बंगारू चेट्टी ज्वेलर्स को सौंपा गया था। तमिलनाडु के तिरुवावदुथुरै अधीनम मठ की पहल पर तैयार किए गए इस राजदंड के निर्माण में वुम्मिडी एथिराज और वुम्मिडी सुधाकर की अहम भूमिका रही।
उस समय एथिराज की उम्र लगभग 22 वर्ष थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, करीब दस कारीगरों ने लगभग 10 से 15 दिनों में पांच फुट लंबा सेंगोल तैयार किया था। इसे चांदी पर सोने की परत चढ़ाकर बनाया गया था।
इसकी सबसे खास पहचान शीर्ष पर बनी नंदी की आकृति है। भारतीय परंपरा में नंदी को स्थिरता, निष्ठा और धार्मिक आस्था से जोड़ा जाता है। सेंगोल पर अन्य प्रतीक भी उकेरे गए थे, जिनमें देवी लक्ष्मी और अनाज की बालियों से जुड़े रूपांकन शामिल बताए जाते हैं।
इतने कम समय में तैयार की गई इस कलाकृति के पीछे कारीगरों की तकनीकी दक्षता, धातु पर बारीक काम और प्रतीकों को सटीक आकार देने की क्षमता थी। यह उस दौर की पारंपरिक भारतीय आभूषण-कला का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है।
नेहरू को सौंपे जाने से संसद तक का सफर
सेंगोल का इतिहास भारत की स्वतंत्रता के शुरुआती दिनों से जुड़ा है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, सी. राजगोपालाचारी की पहल पर तमिल मठ के प्रतिनिधियों ने इसे दिल्ली पहुंचाया था।
14 अगस्त 1947 की रात जवाहरलाल नेहरू को उनके आवास पर आयोजित एक धार्मिक समारोह में सेंगोल सौंपा गया। इस अवसर पर तमिलनाडु से आए संतों ने पारंपरिक रीति से आशीर्वाद दिया था।
हालांकि, इस ऐतिहासिक घटना की व्याख्या करते समय तथ्य और बाद में किए गए दावों के बीच अंतर समझना जरूरी है। सेंगोल सौंपे जाने का उल्लेख ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है, लेकिन इसे ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की औपचारिक और आधिकारिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बताए जाने संबंधी सभी दावों के लिए समान स्तर के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
आजादी के बाद सेंगोल प्रयागराज के इलाहाबाद संग्रहालय में रखा गया। वहां इसकी पहचान नेहरू को भेंट की गई एक सुनहरी छड़ी के रूप में दर्ज थी। यही वजह रही कि समय के साथ इसके निर्माण, उद्देश्य और कारीगरों की भूमिका आम चर्चा से दूर होती चली गई।
71 साल तक परिवार को भी नहीं थी अपने काम की जानकारी
एथिराज की कहानी का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि उनके परिवार को भी दशकों तक यह जानकारी नहीं थी कि उनके पूर्वजों ने देश की आजादी से जुड़ी इस चर्चित धरोहर को बनाया था।
2018 में एक तमिल पत्रिका में प्रकाशित लेख के जरिए परिवार की नई पीढ़ी को सेंगोल के बारे में पता चला। इसके बाद परिवार ने इसकी तलाश शुरू की। आगे की पड़ताल में इलाहाबाद संग्रहालय में रखे एक राजदंड की जानकारी मिली।
परिवार के प्रतिनिधि अरुण कुमार ने संग्रहालय जाकर उसकी पहचान से जुड़े संकेतों की जांच की। राजदंड पर मौजूद तमिल अक्षरों और नंदी की आकृति ने उनकी खोज को महत्वपूर्ण आधार दिया।
एथिराज के बेटे के अनुसार, नंदी की आकृति को सही रूप देने के लिए कारीगरों को कुंभकोणम तक जाना पड़ा था। यह विवरण बताता है कि सेंगोल का निर्माण केवल धातु को आकार देने का काम नहीं था; इसके लिए धार्मिक प्रतीकों की समझ, डिजाइन पर बारीकी और पारंपरिक शिल्प-कौशल की जरूरत थी।
इस घटना से विरासत के संरक्षण से जुड़ा एक बड़ा सवाल भी सामने आता है: क्या संग्रहालयों में रखी ऐतिहासिक वस्तुओं के साथ उनके निर्माताओं, निर्माण प्रक्रिया और पारिवारिक इतिहास का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा रहा है?
2023 में संसद में मिली नई पहचान
28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेंगोल को लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित किया। केंद्र सरकार ने इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा, स्वतंत्रता और न्यायपूर्ण शासन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
इस समारोह में सेंगोल बनाने वाले वुम्मिडी परिवार के सदस्यों को भी सम्मान दिया गया। एथिराज स्वयं कार्यक्रम में शामिल हुए थे और प्रधानमंत्री ने उनके योगदान के लिए आभार व्यक्त किया था।
इस स्थापना के बाद सेंगोल एक संग्रहालय में रखी ऐतिहासिक वस्तु से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। इसके प्रतीकात्मक अर्थ और स्वतंत्रता के समय की भूमिका पर सार्वजनिक चर्चा भी बढ़ी।
लेकिन इस पहचान के पीछे उन कारीगरों का योगदान याद रखना उतना ही जरूरी है, जिनकी मेहनत से यह वस्तु अस्तित्व में आई। ऐतिहासिक धरोहर का महत्व केवल उस स्थान से तय नहीं होता जहां उसे रखा गया है, बल्कि उसके निर्माण, उसके समय और उससे जुड़े लोगों के इतिहास से भी बनता है।
एथिराज का निधन: भारतीय पारंपरिक शिल्प के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति
एथिराज के निधन के साथ उस पीढ़ी के एक ऐसे कारीगर की विदाई हुई, जिसका काम भारतीय इतिहास की एक चर्चित वस्तु से जुड़ा है। उनका जीवन पारंपरिक कारीगरी की उस विरासत की याद दिलाता है, जिसमें शिल्पकार अपनी कला से अमूल्य रचनाएं तैयार करते हैं, लेकिन अक्सर उनकी व्यक्तिगत पहचान पीछे रह जाती है।
आज जब मशीनों और बड़े पैमाने पर उत्पादन का विस्तार हो रहा है, तब पारंपरिक शिल्प को संरक्षित करना केवल सांस्कृतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कौशल और ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी सवाल है। ऐसे कारीगरों के अनुभव, तकनीक और निर्माण पद्धतियों का दस्तावेजीकरण आने वाले समय में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
सेंगोल की कहानी यह भी सिखाती है कि इतिहास को समझने के लिए केवल बड़े नेताओं और राजनीतिक घटनाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। कारीगरों, कलाकारों और उन लोगों को भी जगह देनी चाहिए, जिनके श्रम ने ऐतिहासिक क्षणों को मूर्त रूप दिया।
वुम्मिडी एथिराज अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके हाथों से बनी धरोहर संसद में मौजूद है। उनकी विरासत को वास्तविक सम्मान तभी मिलेगा, जब सेंगोल की चर्चा के साथ उसके निर्माताओं की कला, मेहनत और ऐतिहासिक योगदान को भी याद रखा जाएगा।




