राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने 2025 में अपने 100 वर्ष पूरे किए हैं। देशभर में संगठन के कार्यकर्ता इस ऐतिहासिक वर्ष को बड़े उत्साह के साथ मना रहे हैं। आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी, और आज यह भारत का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में कई राज्यों में ‘एक भारत, सशक्त भारत’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सांस्कृतिक परेड, संगोष्ठियाँ और जनसंवाद शामिल हैं।
कर्नाटक में विवाद कैसे शुरू हुआ?
कर्नाटक के चित्तापुर जिले में आरएसएस ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर मार्च (परेड) निकालने की अनुमति मांगी थी। लेकिन स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए इसकी अनुमति देने से इंकार कर दिया। इसके विरोध में आरएसएस समर्थकों ने इसे “अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक” बताया, जबकि भीम आर्मी और इंडियन दलित पैंथर्स जैसे संगठनों ने प्रशासन के फैसले का समर्थन किया और विरोध प्रदर्शन की घोषणा की। इसके चलते शहर में तनावपूर्ण माहौल बन गया है, और पुलिस ने कई संवेदनशील इलाकों में धारा 144 लागू कर दी है।
राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप
आरएसएस के शताब्दी समारोह को लेकर राजनीतिक दलों के बीच भी घमासान शुरू हो गया है। भाजपा नेताओं ने कहा कि सरकार जानबूझकर संगठन की गतिविधियों पर रोक लगा रही है। वहीं कांग्रेस और वामपंथी दलों का कहना है कि सार्वजनिक मार्च से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है, इसलिए प्रशासन ने सही कदम उठाया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर कदम उठा रही है और किसी भी पक्ष को कानून हाथ में नहीं लेने दिया जाएगा।
सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारी
कर्नाटक पुलिस ने संभावित झड़पों की आशंका के चलते राज्यभर में सुरक्षा बढ़ा दी है। 2,000 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। ड्रोन और CCTV निगरानी की जा रही है। प्रशासन ने अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है।स्थानीय प्रशासन ने अपील की है कि लोग शांति और सद्भाव बनाए रखें तथा किसी भी उकसावे में न आएँ।
RSS का कहना क्या है?
RSS प्रवक्ताओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रचार करना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शताब्दी समारोह के तहत आयोजित सभी कार्यक्रम कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से होंगे।आरएसएस ने प्रशासन से दोबारा अनुमति की मांग की है और कहा है कि संगठन सहयोगात्मक तरीके से कार्यक्रम आयोजित करना चाहता है।
समाज के विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रिया
- धार्मिक संगठन: कुछ संगठनों ने इसे सामाजिक एकता के लिए अच्छा कदम बताया, जबकि अन्य ने इसे “धार्मिक ध्रुवीकरण” की कोशिश कहा।
- शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी: कई लोगों ने सुझाव दिया कि शताब्दी वर्ष को संवाद और राष्ट्रनिर्माण के प्रतीक के रूप में मनाना चाहिए, न कि टकराव के रूप में।
- स्थानीय जनता: आम नागरिकों में चिंता है कि यदि माहौल बिगड़ा, तो इससे व्यापार और त्योहारों पर असर पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर माहौल
सोशल मीडिया पर #RSS100Years और #KarnatakaTension जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई यूजर्स ने आरएसएस के योगदान को सराहा, वहीं कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित आयोजन बताया। ट्विटर (X), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर वीडियो और बयान तेजी से वायरल हो रहे हैं।
आगे की राह क्या होगी?
वर्तमान स्थिति में राज्य सरकार और आरएसएस के बीच संवाद की संभावना बनी हुई है। यदि दोनों पक्ष सहयोग और शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालते हैं, तो यह विवाद टल सकता है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि सांस्कृतिक आयोजनों में प्रशासनिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना आज भी बड़ी चुनौती है।


