जयशंकर या डोभाल? विदेश नीति पर पृथ्वीराज चव्हाण के सवाल ने छेड़ी बड़ी बहस, समझिए NSA और विदेश मंत्री की भूमिका
नई दिल्ली। भारत की विदेश नीति को लेकर कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के एक सवाल ने सरकार की विदेश नीति की निर्णय-प्रक्रिया और जवाबदेही पर बहस को फिर सामने ला दिया है। चव्हाण ने सवाल उठाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की भूमिकाओं का वास्तविक बंटवारा किस तरह किया गया है।
यह सवाल केवल दो शीर्ष अधिकारियों की भूमिका तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह बड़ा मुद्दा है कि विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक कूटनीति जैसे संवेदनशील विषयों में राजनीतिक जवाबदेही और प्रशासनिक विशेषज्ञता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।
विदेश मंत्री और NSA की भूमिकाएं एक जैसी नहीं
भारत की शासन व्यवस्था में विदेश मंत्री एक राजनीतिक पद पर रहते हुए विदेश मंत्रालय का नेतृत्व करते हैं और संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं। इसके विपरीत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में रणनीतिक सलाह देने वाला पद है।
यही अंतर पृथ्वीराज चव्हाण के सवाल का मुख्य आधार है। उनका तर्क है कि विदेश नीति से जुड़े निर्णयों में संसद के प्रति जवाबदेही महत्वपूर्ण है और इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि विदेश मंत्रालय तथा राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के बीच जिम्मेदारियां कहां से शुरू और कहां खत्म होती हैं।
हालांकि, किसी विदेश नीति प्रक्रिया में NSA की सक्रिय भूमिका अपने आप में असामान्य नहीं मानी जा सकती। राष्ट्रीय सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ रणनीतिक संवाद, खुफिया सूचनाओं और संवेदनशील कूटनीतिक वार्ताओं में NSA की भूमिका प्रधानमंत्री को रणनीतिक सलाह देने तक विस्तृत हो सकती है। असली प्रश्न यह है कि अंतिम नीति-निर्णय और उसकी राजनीतिक जवाबदेही किस संस्थागत व्यवस्था के तहत होती है।
चीन और रूस के संदर्भ में क्यों उठा सवाल?
चव्हाण ने BRICS शिखर सम्मेलन से पहले अजीत डोभाल की चीन यात्रा और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रूस से जुड़ी कूटनीतिक गतिविधियों का उल्लेख करते हुए जिम्मेदारियों के बंटवारे पर सवाल किया है।
यह संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को एक साथ कई संवेदनशील रिश्तों को संभालना पड़ रहा है। चीन के साथ सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मुद्दा है, रूस भारत का लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा साझेदार रहा है, जबकि अमेरिका और यूरोप के साथ भारत के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध भी लगातार महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे वातावरण में विदेश नीति किसी एक द्विपक्षीय रिश्ते तक सीमित नहीं रहती। एक देश के साथ लिया गया निर्णय दूसरे साझेदार के साथ संबंधों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए विदेश मंत्रालय, NSA और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच समन्वय की प्रकृति का महत्व बढ़ जाता है।
BRICS सम्मेलन के बाद चव्हाण ने पूछा—भारत को क्या मिला?
पृथ्वीराज चव्हाण ने 2026 के BRICS सम्मेलन की मेजबानी के लिए सरकार को बधाई देते हुए यह सवाल भी उठाया कि सम्मेलन से भारत को ठोस कूटनीतिक लाभ क्या मिला।
भारत ने 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। आधिकारिक नई दिल्ली घोषणा में बहुपक्षवाद, वैश्विक दक्षिण की भागीदारी, आर्थिक सहयोग, शांति और अंतरराष्ट्रीय विवादों के कूटनीतिक समाधान जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी BRICS अध्यक्षता के दौरान 30 शहरों में 350 से अधिक बैठकों के आयोजन का उल्लेख किया था।
इसलिए BRICS के प्रभाव को केवल किसी एक सम्मेलन के तत्काल परिणाम से मापना आसान नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार, विकासशील देशों की आवाज और सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग जैसे परिणाम लंबे समय में सामने आ सकते हैं।
दूसरी ओर, आलोचना का आधार यह हो सकता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय मंच की सफलता का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक साझेदारी और भारत के वास्तविक कूटनीतिक प्रभाव जैसे परिणामों से किया जाए।
भारत के सामने विदेश नीति की चुनौती पहले से अधिक जटिल
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत के सामने एक साथ कई दबाव हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया का तनाव, अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध, चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा आपूर्ति की जरूरतें भारतीय विदेश नीति को लगातार संतुलन की स्थिति में रखती हैं।
सितंबर 2026 में अमेरिका की ओर से रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर संभावित अतिरिक्त टैरिफ को लेकर भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों पर असर को लेकर चिंता जताई है।
इसी दौरान BRICS में पश्चिम एशिया के संकट पर सदस्य देशों के अलग-अलग हितों के बीच सहमति बनाने की चुनौती भी सामने रही। सम्मेलन की घोषणा में संघर्षों के समाधान के लिए संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय प्रयासों पर जोर दिया गया।
यानी भारत की विदेश नीति के सामने अब केवल “किस देश के साथ संबंध अच्छे हैं” वाला सवाल नहीं है। असली चुनौती यह है कि विरोधी हितों वाले देशों के साथ एक साथ रणनीतिक संबंध कैसे बनाए रखे जाएं।
बहस का असली केंद्र जवाबदेही और समन्वय
पृथ्वीराज चव्हाण के बयान को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से विदेश नीति में जिम्मेदारियों के बंटवारे को स्पष्ट करने की मांग की है। यह उनका राजनीतिक सवाल है; सरकार की ओर से इस विशेष आरोप पर क्या जवाब दिया जाता है, उससे इस बहस का अगला चरण तय होगा।
दूसरी ओर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर हालिया BRICS मंचों पर बदलती वैश्विक व्यवस्था, आर्थिक अस्थिरता और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका पर भारत का पक्ष रखते रहे हैं।
इससे स्पष्ट है कि विदेश नीति में अलग-अलग संस्थानों और अधिकारियों की भूमिकाएं कई स्तरों पर काम करती हैं। विदेश मंत्रालय सार्वजनिक कूटनीति और औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों का प्रमुख संस्थागत केंद्र है, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार संवेदनशील रणनीतिक और सुरक्षा मामलों में प्रधानमंत्री को सलाह देते हैं।
आगे की चुनौती यही रहेगी कि इन भूमिकाओं के बीच समन्वय प्रभावी होने के साथ-साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति पर्याप्त रूप से जवाबदेह भी बनी रहे।
आने वाले समय में क्या होगा महत्वपूर्ण?
भारत की विदेश नीति पर इस बहस का महत्व इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि देश अब वैश्विक राजनीति में एक साथ कई मंचों पर सक्रिय है। BRICS, G20, QUAD, SCO और द्विपक्षीय साझेदारियों के बीच भारत को अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों का संतुलन बनाना पड़ रहा है।
इस परिस्थिति में किसी भी सरकार के लिए केवल विदेश यात्राओं और शिखर सम्मेलनों की संख्या सफलता का पैमाना नहीं हो सकती। वास्तविक कसौटी यह होगी कि इन कूटनीतिक प्रयासों से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, रक्षा क्षमता, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभाव कितना मजबूत होता है।



