नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महिला वकीलों की एक याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है, जिसमें मांग की गई है कि POSH एक्ट (Workplace Sexual Harassment Act, 2013) वकीलों और बार काउंसिल / बार एसोसिएशन पर भी लागू किया जाए। यह मामला विशेष रूप से बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देता है, जिसमें हाई कोर्ट ने तय किया था कि POSH एक्ट वकीलों पर लागू नहीं होती क्योंकि वकील और बार काउंसिल के बीच “नियोक्ता-कर्मचारी (employer-employee)” संबंध नहीं माना जा सकता।
याचिका सुप्रीम कोर्ट वुमन लॉयर्स एसोसिएशन ने दायर की है, वरिष्ठ अधिवक्ता महालक्ष्मी पावनी और अधिवक्ता स्निहा कलिता की ओर से। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हाई कोर्ट का फैसला महिलाओं वकीलों के लिए राहत की बड़ी कमी पैदा करता है, क्योंकि बार काउंसिलें POSH के अंतर्गत आने वाली शिकायतों के लिए स्थायी समिति (ICC) स्थापित नहीं कर पाएंगी। उन्होंने यह तर्क दिया है कि हाई कोर्ट ने POSH एक्ट की व्याख्या बहुत सीमित रखी है — क्योंकि हाई कोर्ट ने वकीलों की शिकायतों के लिए बार काउंसिल को “नियोक्ता” नहीं माना। साथ ही, याचिका में कहा गया है कि अदालत ने यह गलत माना कि सेक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायतों के लिए वकील Section 35 of Advocates Act, 1961 के जरिए ही जाएँ, क्योंकि वह अनुभाग “पेशेवर अनुशासन” से जुड़ी शिकायतों के लिए है, हैरेसमेंट के लिए नहीं। याचिकाकर्ता यह भी बताते हैं कि POSH एक्ट का मूल उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित कार्यस्थल देना है — और ऐसा व्याख्या करना जो वकीलों को बाहर रखे, इस उद्देश्य के खिलाफ है। याचिका यह भी कहती है कि अलग-अलग राज्यों में POSH के दायरे को लेकर असमान सुरक्षा है, जो कानून की “व्यापक” व्याख्या के सिद्धांत के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन हैं, जिन्होंने केंद्र (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को इस याचिका पर जवाब देने का नोटिस जारी किया है। कोर्ट इस मामले को पहले से दायर एक समान याचिका के साथ जोड़ रही है। इससे यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट यह तय करना चाहेगी कि POSH एक्ट को “वकील-संघों” (Bar Councils / Bar Associations) पर कैसे और किस हद तक लागू किया जाए।
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अगर एक्ट लागू किया गया, तो महिला वकील भी बार काउंसिल / एसोसिएशन में यौन उत्पीड़न की शिकायत करके न्यायिक रूप से सुरक्षित हो सकेंगी। यह उनके पेशे में एक बड़ा बदलाव हो सकता है।यह मामला “नियोक्ता-कर्मचारी संबंध” की पुरानी कानूनी धारणाओं पर चुनौती है — और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह तय हो सकता है कि पेशेवर निकायों जैसे बार काउंसिल को POSH एक्ट के दायरे में कैसे देखा जाए।यह निर्णय महिलाओं को उनके पेशेवर स्थानों पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ मजबूत कानूनी सुरक्षा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। विशेष रूप से उन पेशों में, जहाँ “नियोक्ता / कर्मचारी” संबंध पारंपरिक रूप से मौजूद नहीं होते।
यदि सुप्रीम कोर्ट याचिका को मंजूरी देता है, तो यह बार काउंसिल और बार एसोसिएशन को बनाने का दबाव बढ़ा सकता है।


