प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में महाभारत और भगवद्गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि गीता केवल धर्म और अध्यात्म का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन संघर्षों का मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि गीता हमें बताती है कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि करुणा और कर्तव्य का पालन।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा—
“भगवद्गीता ने हमें सिखाया है कि अत्याचारियों का अंत भी आवश्यक है। अन्याय और दमन के सामने मौन रहना अधर्म को बढ़ावा देता है। गीता कहती है कि धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प और संघर्ष दोनों जरूरी हैं।”उन्होंने कहा कि आधुनिक समाज में भी गीता का संदेश उतना ही प्रासंगिक है और युवाओं को इसके आदर्श अपनाने चाहिए।
यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक विरासत को समर्पित था, जिसमें कई विद्वानों, संतों और छात्रों ने हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि नेतृत्व, निर्णय क्षमता और कठिन परिस्थितियों में धैर्य सिखाने वाली अद्भुत प्रेरणा है।प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि समाज में हिंसा, भ्रष्टाचार और आतंक जैसे मुद्दों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करना गीता के मूल सिद्धांतों में से एक है।
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उन्होंने कहा—“युद्ध या हिंसा समाधान नहीं है, लेकिन जब अन्याय अपनी सीमा पार कर जाए, तो निर्णायक कदम उठाना ही धर्म होता है।”मोदी ने देश के युवाओं से कहा कि वे गीता के आदर्शों को जीवन में अपनाएं, क्योंकि यह मानसिक शक्ति, सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


