MP में सांची का बड़ा डेयरी विस्तार, लेकिन किसानों का सवाल—दूध बढ़ेगा तो भुगतान कितना बढ़ेगा?
भोपाल। मध्यप्रदेश में सांची डेयरी के विस्तार की योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार और डेयरी तंत्र अगले कुछ वर्षों में दूध संग्रह, प्रसंस्करण क्षमता और सहकारी समितियों का नेटवर्क बड़े स्तर पर बढ़ाने की तैयारी में हैं। दूसरी ओर, दूध उत्पादन करने वाले किसानों की चिंता अलग है—जब चारा, पशु आहार, दवाइयों और पशुपालन की लागत लगातार बढ़ रही है, तो उन्हें मिलने वाला भुगतान उनकी लागत के अनुरूप कितना है?
इंदौर और आसपास के इलाकों में दुग्ध उत्पादकों की ओर से फैट के आधार पर भुगतान बढ़ाने की मांग इसी सवाल को सामने ला रही है। किसानों की मांग है कि प्रति फैट भुगतान बढ़ाकर 10 से 12 रुपये के स्तर पर किया जाए। उनका कहना है कि मौजूदा दर पर पशुपालन की वास्तविक लागत निकालना मुश्किल हो रहा है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सांची को अगले पांच वर्षों में दूध खरीद और प्रोसेसिंग के मामले में कई गुना विस्तार देने की योजना पर काम हो रहा है।
सांची के विस्तार की रफ्तार और किसानों की चिंता
मध्यप्रदेश सरकार ने डेयरी क्षेत्र के लिए करीब 2,973 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। NDDB के अनुसार इस योजना का एक प्रमुख लक्ष्य अगले पांच वर्षों में दूध की खरीद क्षमता को लगभग 52 लाख लीटर प्रतिदिन तक ले जाना है। इसके साथ गांव स्तर पर सहकारी नेटवर्क, प्रसंस्करण और विपणन ढांचे को मजबूत करने की योजना भी जुड़ी है।
यानी आने वाले वर्षों में सांची को ज्यादा दूध चाहिए होगा। इसके लिए अधिक से अधिक पशुपालकों को सहकारी व्यवस्था से जोड़ना स्वाभाविक रूप से जरूरी होगा।
यहीं किसानों की भुगतान संबंधी मांग महत्वपूर्ण हो जाती है। दूध संग्रह बढ़ाने के लिए केवल समितियां खोलना पर्याप्त नहीं है। किसान तभी लंबे समय तक सहकारी व्यवस्था से जुड़े रहेंगे, जब उन्हें उनके दूध की गुणवत्ता और लागत के अनुरूप आर्थिक लाभ भी दिखाई देगा।
फैट रेट क्यों बन गया मुख्य मुद्दा?
दूध की खरीद में केवल लीटर की मात्रा नहीं देखी जाती। फैट और अन्य गुणवत्ता मानकों के आधार पर भुगतान तय होता है। इसलिए किसानों के लिए प्रति फैट मिलने वाली दर सीधे उनकी आमदनी को प्रभावित करती है।
इंदौर क्षेत्र के किसानों ने हाल में गांव-गांव ज्ञापन अभियान के दौरान भी लागत आधारित दूध कीमत, लंबित बोनस और अतिरिक्त प्रोत्साहन की मांग उठाई थी। किसानों ने चारा, पशु आहार, दवाइयों, बिजली और मजदूरी जैसी लागत बढ़ने का हवाला दिया है।
यानी विवाद केवल एक रुपये या दो रुपये की दर बढ़ाने का नहीं है। असल सवाल यह है कि दूध की खरीद कीमत तय करते समय पशुपालक की वास्तविक लागत और उसके जोखिम को कितना महत्व दिया जा रहा है।
सांची के सामने दूसरा पक्ष भी है—लागत और बाजार
किसानों की मांग को समझने के साथ डेयरी संघ की आर्थिक स्थिति को देखना भी जरूरी है। दूध खरीदने के बाद सहकारी संस्था को उसे ठंडा करने, परिवहन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, भंडारण और बाजार तक पहुंचाने पर खर्च करना पड़ता है।
सांची की आधिकारिक खरीद दरों में क्षेत्र के अनुसार अंतर भी दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर वर्तमान दर तालिका में भैंस के दूध के लिए प्रति किलोग्राम फैट की दर भोपाल में 785 रुपये और इंदौर में 780 रुपये दर्ज है। इसी तरह 6 प्रतिशत फैट और 9 प्रतिशत SNF वाले दूध के लिए इंदौर की दर 48.20 रुपये प्रति लीटर दर्ज है।
इसलिए खरीद दर में बदलाव का असर केवल किसान की आय पर नहीं, बल्कि पूरी डेयरी की लागत संरचना पर पड़ता है। यही कारण है कि समाधान के लिए केवल खरीद मूल्य बढ़ाने या नहीं बढ़ाने के बजाय पूरी वैल्यू चेन का आर्थिक आकलन जरूरी होगा।
विस्तार और भुगतान—दोनों को साथ चलाना क्यों जरूरी?
डेयरी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने का सबसे महत्वपूर्ण आधार पशुपालक है। अगर किसान दूध उत्पादन बढ़ाने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं रहेगा, तो बड़े प्रोसेसिंग प्लांट और बढ़ती संग्रह क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है।
दूसरी तरफ, यदि सहकारी संस्था बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमत पर दूध और दुग्ध उत्पाद बेचकर अपने संचालन खर्च को नियंत्रित नहीं कर पाती, तो खरीद मूल्य में लगातार वृद्धि भी उसके लिए वित्तीय दबाव पैदा कर सकती है।
इसलिए सांची के विस्तार की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना केवल यह नहीं होगा कि वह प्रतिदिन कितना दूध खरीदता है, बल्कि यह भी होगा कि उस नेटवर्क से जुड़े पशुपालकों की आय और डेयरी की वित्तीय स्थिरता में कितना सुधार आता है।
आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि खरीद दरों में बदलाव संभव है
सांची के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी अलग-अलग समय पर खरीद दरों में संशोधन दर्ज हैं। भोपाल दुग्ध संघ ने जून 2026 में दूध खरीद दर बढ़ाकर 870 रुपये प्रति किलोग्राम फैट करने की जानकारी दी थी। संघ ने इसे अपने इतिहास में महत्वपूर्ण वृद्धि बताया था।
इससे यह संकेत मिलता है कि खरीद दर कोई स्थिर व्यवस्था नहीं है। बाजार की स्थिति, लागत और संगठन की वित्तीय क्षमता के अनुसार इसमें बदलाव संभव है।
इसी वजह से वर्तमान विरोध का समाधान भी बातचीत और आंकड़ों पर आधारित मूल्य समीक्षा के जरिए निकाला जा सकता है।
किसानों के लिए सिर्फ खरीद दर नहीं, बोनस और लागत भी अहम
दुग्ध उत्पादकों की आय को केवल दूध के बेस रेट से देखना पर्याप्त नहीं होगा। पशुपालक के लिए चारा, पशु आहार, पशु चिकित्सा, दवाइयां, श्रम, बिजली और पशु के रखरखाव की लागत महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा दूध की गुणवत्ता, नियमित आपूर्ति और पशु उत्पादकता बढ़ाने वाली सेवाएं भी किसान की वास्तविक आय को प्रभावित करती हैं।
इसलिए यदि सांची बड़े स्तर पर दूध संग्रह बढ़ाना चाहता है तो सहकारी मॉडल में खरीद मूल्य के साथ पशु स्वास्थ्य, पोषण, चारा उपलब्धता, उत्पादकता और समय पर भुगतान को भी विस्तार योजना का हिस्सा बनाना महत्वपूर्ण होगा।
52 लाख लीटर का लक्ष्य, असली परीक्षा किसान का भरोसा
NDDB की योजना के मुताबिक दूध खरीद क्षमता को लगभग 52 लाख लीटर प्रतिदिन तक ले जाने का लक्ष्य है। इसके लिए केवल नए संग्रह केंद्र बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
किसानों का भरोसा इस विस्तार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रहेगा।
अगर किसान को लगे कि सहकारी समिति के माध्यम से उसे स्थिर बाजार, पारदर्शी फैट टेस्टिंग, समय पर भुगतान और लागत के अनुरूप बेहतर आर्थिक अवसर मिल रहे हैं, तो नेटवर्क का विस्तार अधिक टिकाऊ हो सकता है। दूसरी ओर, यदि उत्पादन बढ़ाने का दबाव बढ़ता है लेकिन किसान की प्रति लीटर या प्रति फैट आय उसी गति से नहीं बढ़ती, तो सहकारी नेटवर्क में किसानों की भागीदारी बनाए रखना चुनौती बन सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल किसानों की ओर से 10 से 12 रुपये प्रति फैट तक भुगतान बढ़ाने की मांग सामने आई है, जबकि सांची प्रबंधन की ओर से मौजूदा दर को तत्काल इस स्तर तक बढ़ाना संभव नहीं बताया गया है। प्रबंधन का जोर दूध संग्रह बढ़ाने के साथ प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने पर है।



