नवीनतम केयरएज (CareEdge) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में नेट एफडीआई (Foreign Direct Investment) में तेज गिरावट आई है, जो FY20 के US $44 बिलियन से घटकर FY25 में मात्र लगभग US $1 बिलियन तक रह गया है। जबकि ग्रॉस एफडीआई इंफ्लो—भारत में विदेशी निवेश के रूप में आने वाली कुल पूंजी—लगातार मजबूत रही, बड़ी रकम विदेशी कंपनियों द्वारा लाभ वापस ले जाने (repatriation) और निवेश की वापसी के कारण नेट आंकड़ा काफी नीचे आ गया है। इस व्यापक गिरावट ने नीति निर्माताओं और निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट सिर्फ निवेश में कमी नहीं बल्कि विदेशी कंपनियों का भारत में कम समय के लिए पूंजी रोककर लाभ निकालना और भारतीय कंपनियों का स्वयं विदेशों में निवेश करना जैसे कारकों का नतीजा है। इसी वजह से नेट एफडीआई इतनी कम दिख रहा है, जबकि भारत अभी भी अपने मजबूत ग्रॉस एफडीआई के कारण वैश्विक निवेश आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था की परिपक्वता और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का संकेत भी माना जा रहा है, जिससे यह सवाल उठ रहे हैं कि सरकार को क्या नई नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है ताकि विदेशी निवेश स्थिर रहे और भारत में लंबे समय तक रुके।
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इस गिरावट के बावजूद रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में एफडीआई से मिलने वाला औसत रिटर्न लगभग 7.3% है, जो कई उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर है। इसका मतलब यह है कि निवेशक अभी भी भारत के दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को देखते हैं, लेकिन नेट इनफ्लो को मजबूत करने के लिए नीति समायोजन और निवेशकों के भरोसे को बनाए रखना जरूरी है।


