महासमुंद में श्रमिक नेटवर्क पर पुलिस की नजर, ‘भट्ठा सरदार’ जगत गुप्ता के घर दबिश से फिर गरमाया मामला
महासमुंद। जिले में मौसमी श्रमिक पलायन से जुड़े मामलों के बीच गुरुवार को बाम्हनडीह में पुलिस की एक कार्रवाई ने पुराने प्रकरण को फिर चर्चा में ला दिया। श्रमिकों को दूसरे राज्यों के ईंट भट्ठों तक ले जाने के मामलों में चर्चित जगत कुमार गुप्ता उर्फ अजगर के घर पुलिस टीम के पहुंचने की जानकारी सामने आई है। इसी दौरान खरियाररोड क्षेत्र में श्रमिक दलाली से जुड़े बताए जा रहे एक अन्य व्यक्ति के घर भी पुलिस टीम के पहुंचने की बात सामने आई।
हालांकि, देर शाम तक पुलिस की ओर से इन दोनों कार्रवाइयों को लेकर विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई थी। इसलिए छापे का सटीक उद्देश्य, पुलिस को क्या मिला और दोनों स्थानों की कार्रवाई के बीच कोई संबंध है या नहीं, इन सवालों का जवाब आधिकारिक जांच विवरण सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
शत्रुघ्न खड़िया की मौत के बाद सामने आया था मामला
जगत गुप्ता का नाम इससे पहले श्रमिक शत्रुघ्न खड़िया की आत्महत्या के मामले में सामने आया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अक्टूबर 2025 में पटेवा थाना क्षेत्र के बनपचरी निवासी 40 वर्षीय शत्रुघ्न खड़िया ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली थी।
पुलिस जांच में यह बात सामने आई थी कि मृतक ने आत्महत्या से पहले पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आवेदन दिया था। इसमें ईंट भट्ठे में काम करने और दूसरे राज्य जाने के लिए कथित तौर पर दबाव बनाए जाने तथा धमकी दिए जाने की शिकायत का उल्लेख था।
मर्ग जांच के दौरान परिजनों और स्वतंत्र गवाहों के बयान लिए गए। जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस ने जगत कुमार गुप्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत मामला दर्ज किया था। BNS की धारा 108 आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से संबंधित है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होना या गिरफ्तारी होना अदालत द्वारा दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। मामले की अंतिम स्थिति न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करती है।
‘भट्ठा सरदार’ की भूमिका क्यों जांच के दायरे में?
महासमुंद और आसपास के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार के लिए कुछ महीनों के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। ईंट भट्ठे, निर्माण कार्य और अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम के लिए श्रमिकों को ठेकेदारों या श्रमिक समूहों के माध्यम से बाहर ले जाया जाता है।
यह व्यवस्था अपने आप में अवैध नहीं है, लेकिन समस्या उस समय पैदा होती है जब रोजगार के नाम पर श्रमिकों पर दबाव, धमकी, बंधन, अनुचित अग्रिम भुगतान या मजदूरी से जुड़ी शर्तों को लेकर विवाद खड़े हों। ऐसे मामलों में केवल श्रमिक को बाहर ले जाने वाले व्यक्ति की भूमिका ही नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
इसी वजह से बाम्हनडीह में हुई ताजा पुलिस कार्रवाई को केवल एक व्यक्ति के घर हुई दबिश के रूप में देखने के बजाय श्रमिकों के अंतरराज्यीय पलायन की निगरानी के व्यापक संदर्भ में देखना जरूरी है।
मौसमी पलायन के पीछे रोजगार की मजबूरी
किसान परिवारों में खेती का प्रमुख काम पूरा होने के बाद कुछ महीनों के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर सीमित हो जाते हैं। ऐसे में श्रमिक दूसरे राज्यों में जाकर काम करना पसंद करते हैं, क्योंकि वहां उन्हें अपेक्षाकृत लंबे समय तक काम मिलने की उम्मीद रहती है।
लेकिन असंगठित क्षेत्र में होने वाला यह पलायन कई बार औपचारिक रिकॉर्ड से बाहर रह जाता है। श्रमिक कहां जा रहा है, किस ठेकेदार के माध्यम से जा रहा है, उसे कितनी मजदूरी मिलेगी, अग्रिम राशि कितनी है और काम की अवधि क्या होगी—इन सवालों का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं होने पर विवाद की स्थिति में श्रमिक के सामने अपनी बात साबित करना कठिन हो सकता है।
यही कारण है कि श्रमिक पलायन के मामलों में पंजीयन, ठेकेदारों की निगरानी, काम की शर्तों की जानकारी और श्रमिकों की शिकायत व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
927 पंजीकृत श्रमिकों का आंकड़ा क्या बताता है?
उपलब्ध जानकारी में श्रम विभाग के आंकड़ों के हवाले से महासमुंद जिले से 927 श्रमिकों के पंजीकृत पलायन का उल्लेख है। वहीं भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिकों के प्रवासी पंजीयन में 4,531 श्रमिकों के पंजीकृत होने की जानकारी दी गई है।
इन आंकड़ों को जिले से होने वाले कुल वास्तविक पलायन का अंतिम आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। असंगठित क्षेत्र में होने वाले कई प्रवास औपचारिक पंजीयन से बाहर रह सकते हैं। इसलिए वास्तविक स्थिति समझने के लिए सरकारी पंजीयन के साथ जमीनी स्तर पर श्रमिकों और उनके परिवारों से मिलने वाली जानकारी भी महत्वपूर्ण होती है।
अब पुलिस की अगली कार्रवाई पर नजर
बाम्हनडीह में जगत गुप्ता के घर हुई कथित दबिश और खरियाररोड में दूसरी कार्रवाई को लेकर फिलहाल कई सवाल अनुत्तरित हैं। क्या पुलिस ने किसी पुराने मामले की कड़ियां जोड़ने के लिए कार्रवाई की? क्या कोई दस्तावेज या अन्य सामग्री जांच के दायरे में आई? क्या दोनों स्थानों की कार्रवाई एक ही प्रकरण से संबंधित है? इन सवालों पर अभी आधिकारिक स्थिति सामने नहीं आई है।
ऐसे में बिना पुलिस पुष्टि के किसी बरामदगी, नई गिरफ्तारी या किसी व्यक्ति की भूमिका को लेकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।



