मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Iran और United States के बीच संभावित टकराव को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। यदि हालात सीधे युद्ध की ओर बढ़ते हैं तो यह सिर्फ दो देशों का संघर्ष नहीं होगा, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्ग और सुरक्षा समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
संभावित युद्ध की स्थिति में ईरान को कुछ हद तक रूस और चीन जैसे देशों का कूटनीतिक समर्थन मिल सकता है। Russia और China पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों के मुद्दे पर ईरान के साथ खड़े नजर आए हैं, हालांकि खुलकर सैन्य हस्तक्षेप की संभावना कम मानी जाती है। वहीं, लेबनान का संगठन Hezbollah और यमन के हूती विद्रोही भी ईरान के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय संघर्ष और व्यापक हो सकता है।
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दूसरी ओर, अमेरिका को नाटो सहयोगियों और खाड़ी देशों का समर्थन मिल सकता है। NATO के सदस्य देश सीधे तौर पर शामिल हों या न हों, लेकिन रणनीतिक और लॉजिस्टिक सहयोग संभव है। सऊदी अरब, इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी अमेरिका के साथ खड़े दिख सकते हैं, हालांकि वे प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सवाल यही है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो क्या ईरान इस कड़े इम्तिहान को पार कर पाएगा, या फिर वैश्विक दबाव उसे पीछे हटने पर मजबूर कर देगा।


