रायपुर: छत्तीसगढ़ की मशहूर ढोकरा शिल्प कलाकार हीराबाई झरेका बघेल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया है। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें यह सम्मान उनकी अनूठी बेलमेटल यानी ढोकरा कला को संरक्षित और समृद्ध बनाने के लिए दिया गया। हीराबाई की इस उपलब्धि पर पूरे प्रदेश में खुशी का माहौल है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान छत्तीसगढ़ की कला और शिल्प विरासत का मान बढ़ाने वाला है।
छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का पल
सीएम साय ने कहा कि वनांचल क्षेत्र की ग्राम पंचायत बैगीनडीह से निकलकर हीराबाई ने अपनी कला से न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश में पहचान बनाई है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार कला संरक्षण, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने के लिए निरंतर कार्य कर रही है, ताकि ऐसी प्रतिभाएं और आगे बढ़ सकें। यह सम्मान हर उस शिल्पकार का सम्मान है जो अपनी परंपरागत कला को जीवित रखने के लिए मेहनत कर रहा है।
कौन हैं हीराबाई झरेका बघेल?
हीराबाई सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की रहने वाली हैं। वे ढोकरा कला में महारत रखती हैं। खास बात यह है कि उन्होंने यह कौशल अपने पिता भुलाऊ झरेका और पति मिनकेतन बघेल से सीखा। इससे पहले भी उन्हें साल 2011-12 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वहीं, उनके पति को वर्ष 2006-07 में ढोकरा कला के लिए राज्यस्तरीय सम्मान मिल चुका है। यह परिवार पीढ़ियों से इस धातु कला को आगे बढ़ा रहा है।
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क्या है ढोकरा कला?
ढोकरा कला छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी विरासत है, जिसमें धातुओं के मिश्रण से प्राचीन तकनीक के ज़रिए मनमोहक मूर्तियाँ और सजावटी शिल्प तैयार किए जाते हैं। इस कला की खासियत यह है कि हर कृति हस्तनिर्मित होती है और उसका डिज़ाइन एकदम अद्वितीय रहता है। हीराबाई जैसे शिल्पकारों की बदौलत यह पारंपरिक कला आधुनिक समय में भी नई पहचान पा रही है। हीराबाई झरेका बघेल की इस सफलता ने छत्तीसगढ़ के गौरव, कला और संस्कृति को एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर चमका दिया है।


