Heart Blockage Symptoms: आपका दिल कई बार बिना शोर किए संकेत देता है और अगर इन्हें समय रहते पहचान लिया जाए, तो जान बचाई जा सकती है. दुनियाभर में दिल की सबसे आम बीमारी कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, जिसमें दिल तक ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाने वाली नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं. हार्ट की नसें अचानक ब्लॉक नहीं होतीं. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है, इसमें नसों के अंदर फैट जमा होने लगता है. शुरुआत में कोई खास लक्षण नहीं दिखते, लेकिन समय के साथ नसें संकरी और सख्त हो जाती हैं. अक्सर पहला संकेत सीने में दबाव या दर्द के रूप में सामने आता है. रोजमर्रा के काम करते समय सांस फूलना या पैरों में सूजन भी दिल से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस वजह से होता है और इसके बचाव के लिए आप क्या कर सकते हैं.
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क्यों होती है ब्लॉकेज?
एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्लॉकेज का कारण प्लाक होता है. यह कोलेस्ट्रॉल, फैट, कैल्शियम और अन्य तत्वों का मिक्स होता है, जो नसों की दीवारों पर जमा हो जाता है. इससे ब्लड का फ्लो प्रभावित होता है और शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. इसके पीछे कई वजहें होती हैं, जिसमें खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का बढ़ना, अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) का कम होना, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान और डायबिटीज जैसी समस्याएं. ये सभी नसों को नुकसान पहुंचाकर प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं. जब प्लाक बढ़ता है, तो ब्लड का फ्लो कम हो जाता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. कई बार प्लाक फटने पर खून का थक्का बन जाता है, जो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बन सकता है.
कैसे होते हैं इसके लक्षण?
शुरुआती लक्षणों में सीने में जकड़न या दर्द, हल्के काम में सांस फूलना, बिना वजह थकान, कंधे-हाथ या जबड़े तक फैलता दर्द, चक्कर आना और दिल की धड़कन का अनियमित होना शामिल हैं. ब्लॉकेज शरीर के अलग-अलग हिस्सों में अलग असर दिखा सकता है. हार्ट में दर्द और पसीना, दिमाग में सुन्नपन या बोलने में दिक्कत, पैरों में चलने पर दर्द और गर्दन में कमजोरी जैसे संकेत नजर आ सकते हैं.
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कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?
अगर दिक्कत की बात करें तो हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, खराब लाइफस्टाइल, उम्र और पारिवारिक हिस्ट्री इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं. हालांकि, सही खानपान, रेगलुर व्यायाम और समय पर जांच से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. डॉक्टर जांच के लिए ब्लड टेस्ट, ईसीजी, स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राम, एंजियोग्राफी और सीटी स्कैन जैसी जांचें करते हैं, जिससे नसों की स्थिति का सही पता चल सके.


