Health News: बीमारी से पहले बचाव का बड़ा कदम, जेपी नड्डा ने बताया भारत का नया हेल्थ मॉडल
नई दिल्ली। किसी बीमारी का पता तब चले, जब उसका असर शरीर पर गंभीर होने लगे—भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अब इस स्थिति को बदलने की दिशा में काम कर रही है। कैंसर, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की समय रहते पहचान करने से लेकर गर्भवती महिलाओं और बच्चों की नियमित स्वास्थ्य निगरानी तक, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में रोकथाम को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने एक हेल्थ कॉन्क्लेव में इस बदलाव का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 2017 के बाद से बीमारी की शुरुआती पहचान और बचाव पर विशेष ध्यान दिया गया है। उनके मुताबिक, देशभर में करोड़ों लोगों की स्क्रीनिंग की गई है। इन आंकड़ों का महत्व केवल जांच कराने वाले लोगों की संख्या में नहीं, बल्कि इस बात में है कि समय रहते बीमारी का पता चलने से गंभीर जटिलताओं को रोकने के कितने अवसर बनते हैं।
इलाज से पहले बीमारी पकड़ना क्यों है जरूरी?
भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती सिर्फ अस्पतालों और डॉक्टरों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। बड़ी समस्या यह भी है कि अनेक लोग तब तक जांच नहीं कराते, जब तक बीमारी के लक्षण परेशान करने न लगें। डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी स्थितियां लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रह सकती हैं। कुछ प्रकार के कैंसर में भी शुरुआती पहचान उपचार की संभावनाओं को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और आरोग्य मंदिरों के माध्यम से समुदाय के करीब जांच और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया है। यहां 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की गैर-संचारी बीमारियों की स्क्रीनिंग में ओरल कैंसर, महिलाओं में ब्रेस्ट और सर्विक्स कैंसर, डायबिटीज तथा हाइपरटेंशन की जांच शामिल है।
इस व्यवस्था का मकसद लोगों को बीमारी गंभीर होने के बाद अस्पताल पहुंचाने के बजाय जोखिम की पहचान पहले करना है। इससे मरीज को समय पर चिकित्सकीय सलाह मिल सकती है और बीमारी से जुड़ी जटिलताओं को कम करने का अवसर मिल सकता है।
करोड़ों लोगों की स्क्रीनिंग, आंकड़े क्या बताते हैं?
स्वास्थ्य मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से चल रही स्क्रीनिंग गतिविधियों में बड़ी संख्या में लोगों की जांच की गई है।
- हाइपरटेंशन: लगभग 44 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग हुई और करीब 7.6 करोड़ लोगों में इसकी पहचान हुई।
- डायबिटीज: लगभग 44 करोड़ लोगों की जांच की गई और करीब 5 करोड़ लोगों में बीमारी का पता चला।
- ओरल कैंसर: करीब 37.7 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग में लगभग 2.2 लाख संदिग्ध या पहचाने गए मामले दर्ज किए गए।
- ब्रेस्ट कैंसर: लगभग 17.7 करोड़ स्क्रीनिंग में करीब 99 हजार मामले सामने आए।
- सर्विक्स कैंसर: करीब 19.8 करोड़ स्क्रीनिंग में लगभग एक लाख मामले दर्ज किए गए।
ये आंकड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े दायरे को दिखाते हैं। खासकर डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के मामलों की पहचान इस बात को रेखांकित करती है कि नियमित जांच कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, स्क्रीनिंग में किसी बीमारी की पहचान होना और मरीज का इलाज पूरा हो जाना अलग-अलग बातें हैं। जांच के बाद पुष्टि के लिए अतिरिक्त परीक्षण, चिकित्सकीय सलाह, दवाएं और नियमित फॉलो-अप की जरूरत हो सकती है। इसलिए इन आंकड़ों के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि कितने लोगों को समय पर उपचार मिला और कितने मरीज लगातार स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े रहे।
असली परीक्षा स्क्रीनिंग के बाद शुरू होती है
स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जा सकती कि कितने लोगों की जांच हुई। महत्वपूर्ण यह भी है कि जांच में समस्या सामने आने के बाद मरीज को आगे कहां भेजा गया, जरूरी परीक्षण कितनी जल्दी हुए और उपचार शुरू करने में कितनी देर लगी।
मिसाल के तौर पर, किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर अधिक मिलने पर एक ही रीडिंग के आधार पर हर स्थिति में अंतिम निदान नहीं किया जाता। चिकित्सकीय आकलन और जरूरत के अनुसार दोबारा जांच जरूरी हो सकती है। इसी तरह कैंसर की स्क्रीनिंग में असामान्य परिणाम आने पर आगे की जांच से पुष्टि करनी पड़ती है।
यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों और विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्रों तक रेफरल की व्यवस्था मजबूत हो, तो स्क्रीनिंग का लाभ ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है। इसके उलट, जांच के बाद मरीज का फॉलो-अप नहीं होने पर शुरुआती पहचान का संभावित लाभ कम हो सकता है।
यही वजह है कि भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन केवल स्क्रीनिंग की संख्या से नहीं, बल्कि समय पर निदान, उपचार की निरंतरता और बीमारी से होने वाली जटिलताओं में बदलाव से भी किया जाना चाहिए।
जन्म से किशोरावस्था तक बच्चों के टीकाकरण पर जोर
स्वास्थ्य व्यवस्था का दूसरा अहम हिस्सा बच्चों का टीकाकरण है। नड्डा ने जन्म से लेकर 16 वर्ष की उम्र तक बच्चों की टीकाकरण संबंधी निगरानी का उल्लेख किया। नियमित टीकाकरण का उद्देश्य बच्चों को गंभीर संक्रामक बीमारियों से बचाना और समुदाय में बीमारी फैलने का जोखिम कम करना है।
लेकिन टीकाकरण का लाभ तभी पूरी तरह मिल सकता है, जब बच्चों को निर्धारित समय पर सभी जरूरी टीके मिलें। ग्रामीण इलाकों, दूरस्थ बस्तियों और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच वाले परिवारों के लिए टीकाकरण की जानकारी, उपलब्धता और समय पर अगली खुराक सुनिश्चित करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
डिजिटल रिकॉर्ड इस काम में सहायक हो सकते हैं। यदि किसी बच्चे का टीकाकरण छूट गया है, तो रिकॉर्ड के आधार पर स्वास्थ्यकर्मी परिवार से संपर्क कर सकते हैं। हालांकि, डिजिटल व्यवस्था के साथ मैदानी स्तर पर निगरानी और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता भी जरूरी है।
गर्भवती महिलाओं की निगरानी में जोखिम के अनुसार देखभाल
मातृ स्वास्थ्य के मामले में नियमित जांच का महत्व और भी अधिक है। गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे की स्थिति में होने वाले बदलावों को समय पर पहचानना प्रसव से जुड़ी कई जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
नड्डा के अनुसार, सामान्य गर्भावस्था में पांच जांच और दो टीकाकरण का प्रावधान बताया गया, जबकि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी में निगरानी बढ़ाकर आठ जांच तक की जाती है।
व्यवहार में गर्भवती महिला की जरूरत उसकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय आकलन पर निर्भर करती है। जिन महिलाओं में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, एनीमिया या अन्य जोखिम मौजूद हों, उन्हें अतिरिक्त जांच और विशेषज्ञ देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए गर्भावस्था के दौरान केवल निर्धारित जांचों की संख्या पूरी करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि खतरे के संकेतों की पहचान हो, जांच के नतीजों पर कार्रवाई की जाए और आवश्यकता पड़ने पर समय पर उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
सरकारी अस्पतालों में प्रसव की बढ़ती हिस्सेदारी का क्या अर्थ है?
स्वास्थ्य मंत्री ने सरकारी अस्पतालों में प्रसव की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, 2014 में यह हिस्सेदारी लगभग 78 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर 90.6 प्रतिशत हो गई।
यह बदलाव सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव सेवाओं के उपयोग की बढ़ती भूमिका की ओर संकेत करता है। संस्थागत प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता और आपातकालीन चिकित्सा सहायता मां तथा नवजात के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिर भी, संस्थागत प्रसव की संख्या के साथ देखभाल की गुणवत्ता को समझना भी आवश्यक है। प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्टाफ, जरूरी उपकरण, संक्रमण नियंत्रण, रक्त की उपलब्धता और आपातकालीन रेफरल जैसी सुविधाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के परिणामों को प्रभावित करती हैं।
सी-सेक्शन के खर्च को लेकर भी स्पष्ट जानकारी जरूरी है। सरकारी योजनाओं के तहत पात्र लाभार्थियों को मिलने वाली सहायता और मुफ्त उपचार की शर्तें संबंधित योजना तथा अस्पताल के नियमों के अनुसार समझी जानी चाहिए। हर परिस्थिति में सभी खर्चों के स्वतः कवर होने का दावा करने से पहले लागू प्रावधानों की पुष्टि जरूरी है।
डिजिटल हेल्थ मॉडल से क्या बदलेगा?
डिजिटल ट्रैकिंग का उद्देश्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को व्यवस्थित करना, समय पर जांच की याद दिलाना और मरीजों को जरूरी सेवाओं से जोड़ना हो सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किस व्यक्ति की जांच हुई, किसे आगे उपचार की जरूरत है और कौन नियमित फॉलो-अप से छूट गया है।
लेकिन तकनीक अपने आप में समाधान नहीं है। डिजिटल रिकॉर्ड तभी उपयोगी होंगे, जब जानकारी सही हो, स्वास्थ्यकर्मी उसका इस्तेमाल कर सकें और मरीज को वास्तविक चिकित्सा सहायता मिल सके। इसके साथ निजी स्वास्थ्य जानकारी की सुरक्षा और डिजिटल सुविधाओं से वंचित लोगों तक सेवाएं पहुंचाना भी जरूरी है।
भारत में रोकथाम आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था की अगली बड़ी चुनौती यही होगी कि व्यापक स्क्रीनिंग को प्रभावी उपचार और निरंतर देखभाल से जोड़ा जाए।
आगे की राह: बीमारी की पहचान से बेहतर स्वास्थ्य परिणामों तक
जेपी नड्डा द्वारा प्रस्तुत आंकड़े प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े पैमाने पर विस्तार को सामने रखते हैं। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन सेवाओं का लाभ अलग-अलग आयु वर्गों, ग्रामीण और शहरी आबादी तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तक कितनी समानता से पहुंच रहा है।
बीमारी से बचाव और शुरुआती पहचान पर जोर देना स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण दिशा है। लेकिन इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब जांच के बाद मरीज को सही निदान, सुलभ उपचार और नियमित निगरानी मिले।
भारत के लिए अगला कदम स्क्रीनिंग की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ उपचार की गुणवत्ता, रेफरल व्यवस्था और मरीजों के फॉलो-अप को मजबूत करना है। यही वह बदलाव है, जो स्वास्थ्य सेवाओं को केवल बीमारी का इलाज करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़ाकर लोगों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में अधिक प्रभावी बना सकता है।




