नई दिल्ली। बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) अब जलवायु सहनशील और बायो-फोर्टिफाइड फसल किस्मों के विकास पर जोर दे रहा है। इन नई किस्मों का उद्देश्य फसलों की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ अनाज की गुणवत्ता और पोषण स्तर को भी बेहतर बनाना है।
आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट के अनुसार, आज खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन है। बेमौसम बारिश, बढ़ती गर्मी और तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण खासतौर पर गेहूं और मक्का जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। ऐसे में पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव जरूरी हो गया है और किसानों को नई जलवायु सहनशील किस्मों को अपनाना होगा।
उन्होंने बताया कि आईसीएआर ऐसी उन्नत किस्में विकसित कर रहा है जो प्रतिकूल मौसम में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। इनमें से कई किस्में बायो-फोर्टिफाइड हैं, यानी इनसे उगने वाली फसलों में आयरन, जिंक और विटामिन जैसे पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इससे अनाज की गुणवत्ता बेहतर होगी और कुपोषण जैसी समस्याओं से लड़ने में भी मदद मिलेगी।
डॉ. जाट के मुताबिक केवल उन्नत बीज ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि किसानों को अब “स्मार्ट खेती” की ओर बढ़ना होगा। सही समय पर बुवाई, आधुनिक मशीनों का उपयोग और नई तकनीकों को अपनाकर ही इन बीजों से अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। पुराने तरीकों के बजाय वैज्ञानिक पद्धतियों से खेती करने पर फसल गिरने और नुकसान का खतरा भी कम होगा।
उन्होंने कहा कि देश में अब बड़ी संख्या में किसान नई जलवायु सहनशील और बायो-फोर्टिफाइड किस्मों का उपयोग कर रहे हैं। अगर मौसम अनुकूल रहा तो इस साल गेहूं का उत्पादन 12 करोड़ टन से अधिक पहुंच सकता है। इसके अलावा जायद मक्का की नई किस्मों के कारण उत्तर भारत में इसकी खेती का रकबा भी तेजी से बढ़ रहा है।
आईसीएआर ने किसानों को सलाह दी है कि वे अपनी फसल की गुणवत्ता के आधार पर उचित कीमत मांगें। उच्च गुणवत्ता वाले अनाज और पोषक तत्वों से भरपूर फसलों की बाजार में अधिक मांग रहती है, जिससे किसानों की आय बढ़ने की संभावना भी मजबूत होती है।


