देश में तेजी से बढ़ते ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरे) का कुप्रबंधन अब गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप लेता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि खराब नीतिगत क्रियान्वयन और निगरानी की कमी के कारण बड़ी मात्रा में ई-वेस्ट अनौपचारिक सेक्टर में नष्ट हो रहा है। इससे न केवल मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषित हो रहे हैं, बल्कि सोना, चांदी, तांबा और लिथियम जैसे कीमती खनिज भी बेकार हो रहे हैं।
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ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए सरकार ने नियम तो बनाए हैं, लेकिन वास्तविक संग्रह, रीसाइक्लिंग और प्रसंस्करण के सटीक आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। डेटा पारदर्शिता की कमी के कारण यह आकलन करना मुश्किल हो रहा है कि कितनी मात्रा में ई-कचरे का सुरक्षित निपटान हो रहा है और कितना अवैध रूप से जलाया या दफनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समुचित डाटा सार्वजनिक किया जाए और वैज्ञानिक तरीकों से रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिले, तो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कीमती खनिजों की पुनर्प्राप्ति भी संभव हो सकेगी।


