राज्यसभा में आम आदमी पार्टी (आप) के एक सांसद ने ‘राइट टू रिकॉल’ लागू करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जनता को यह अधिकार मिलना चाहिए कि यदि कोई जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करता या जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, तो उसे कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाया जा सके। सांसद ने इसे जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
सदन में बोलते हुए उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव के बाद पांच साल तक जनता के पास अपने प्रतिनिधि को हटाने का कोई संवैधानिक विकल्प नहीं होता, जिससे कई बार जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है। राइट टू रिकॉल व्यवस्था से जनप्रतिनिधियों पर निरंतर जनदबाव बना रहेगा और वे अपने क्षेत्र के विकास और मुद्दों को लेकर अधिक सक्रिय रहेंगे।
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हालांकि इस प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और अन्य दलों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ सदस्यों ने इसे व्यवहारिक चुनौतियों से जुड़ा मुद्दा बताया, जबकि अन्य ने कहा कि इस पर व्यापक बहस और संवैधानिक समीक्षा की जरूरत है। अब देखना होगा कि ‘राइट टू रिकॉल’ की यह मांग आगे किस दिशा में बढ़ती है।


