बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक दुष्कर्म मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दोषी की उम्रकैद की सजा को घटाकर 12 साल कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले की परिस्थितियों, दोषी के व्यवहार और सुधार की संभावना को देखते हुए सजा में कमी की गई है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि जेल में रहते हुए दोषी ने महात्मा गांधी पर एक निबंध लिखा था, जिसे सुधारात्मक प्रयास के रूप में अदालत ने संज्ञान में लिया।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध गंभीर था, लेकिन सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि सुधार का अवसर देना भी है। अदालत ने कहा कि दोषी का जेल में आचरण और पुनर्वास की दिशा में किए गए प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यौन अपराध समाज के लिए अत्यंत गंभीर चिंता का विषय हैं और ऐसे मामलों में कानून सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
इस फैसले को लेकर कानूनी और सामाजिक हलकों में बहस शुरू हो गई है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सुधारात्मक न्याय व्यवस्था का हिस्सा है, जबकि अन्य इसे संवेदनशील मामलों में सजा में नरमी के तौर पर देख रहे हैं। फिलहाल हाई कोर्ट के इस निर्णय ने न्याय व्यवस्था में दंड और सुधार के संतुलन पर नई चर्चा छेड़ दी है।


