बिहार चुनाव 2025 नज़दीक आते ही राज्य की राजनीति में एक बार फिर बाहुबलियों (माफिया नेताओं) का असर दिखाई देने लगा है।जहां एक ओर पार्टियाँ विकास, रोजगार और शिक्षा की बात कर रही हैं, वहीं कई ऐसे उम्मीदवार भी मैदान में हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। राजनीति और अपराध के इस गठजोड़ ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है“क्या इस बार बिहार का वोटर जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर अपराध की राजनीति को नकारेगा?”
राजनीति में बाहुबलियों की एंट्री – एक पुरानी कहानी, नया अध्याय
बिहार की राजनीति में बाहुबलियों की भूमिका नई नहीं है। 90 के दशक से लेकर अब तक राजनीतिक दलों ने अपराधियों को टिकट देने में कोई झिझक नहीं दिखाई, क्योंकि ऐसे उम्मीदवारों का क्षेत्र में जनाधार और जातीय समर्थन मज़बूत होता है। 2025 के चुनाव में भी कई बड़े दलों ने ऐसे चेहरों को टिकट दिया है, जिनके खिलाफ हत्या, रंगदारी, या अपहरण जैसे संगीन आरोप दर्ज हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक,
“दल जानते हैं कि बाहुबली उम्मीदवार अपने इलाके में वोट जुटाने की क्षमता रखते हैं — चाहे वह भय से हो या प्रभाव से।”
जातीय समीकरण बनाम अपराधमुक्त छवि
बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर आधारित रही है। हर पार्टी अपनी रणनीति इसी आधार पर तय करती है। लेकिन बदलते समय के साथ अब एक नई सोच भी उभर रही है — विकास और सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले मतदाताओं की सोच। युवा और शिक्षित वर्ग अब यह सवाल पूछ रहा है “अगर नेता अपराधी होगा, तो राज्य सुरक्षित कैसे रहेगा?” हालिया सर्वे बताते हैं कि बिहार के करीब 62% युवा मतदाता अब जाति से ज्यादा कानून-व्यवस्था और रोजगार को प्राथमिकता देते हैं।
यह संकेत है कि राज्य में धीरे-धीरे राजनीतिक सोच में बदलाव आ रहा है।
बाहुबलियों की पकड़ आज भी क्यों कायम है?
बाहुबली नेताओं की राजनीति की जड़ें गहरी हैं। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:
1. स्थानीय पकड़ और नेटवर्क: बाहुबलियों का अपने क्षेत्र में प्रभाव और संगठन बेहद मजबूत होता है।
2. धनबल का प्रभाव: चुनावी खर्च में भारी निवेश करने की क्षमता।
3. जातीय समर्थन: एक खास जातीय समूह का स्थायी वोट बैंक।
4. भय और भरोसा: कुछ लोग डर से, तो कुछ ‘रक्षक’ के रूप में भरोसे से उन्हें वोट देते हैं।
इसलिए, भले ही जनता बदलाव की बात करे, लेकिन ज़मीनी राजनीति में बाहुबलियों का असर अब भी दिखता है।
क्या बदलेगा इस बार बिहार का मूड?
2025 का चुनाव कई मायनों में अलग है। नई पीढ़ी के वोटर अब सोशल मीडिया और जनजागरण अभियानों के ज़रिए राजनीति को बारीकी से देख रहे हैं। “अपराधी नेताओं को वोट न दें” जैसे कैंपेन लगातार चलाए जा रहे हैं।
दल भी बदले मूड में, पर सीमित स्तर तक
दिलचस्प बात यह है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इस बार ‘साफ छवि वाले उम्मीदवारों’ को प्राथमिकता देने की बात कही है। हालांकि हकीकत में, टिकट बंटवारे में अब भी जाति और जीतने की संभावना ही प्रमुख फैक्टर है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा,
“दल अपराधियों से दूरी बनाने की बात करते हैं, लेकिन जब बात सीट जीतने की आती है, तो सिद्धांत पीछे रह जाते हैं


