बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज वर्गीकरण को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। नए नियमों के अनुसार अब किसी भी लोन को तभी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) माना जाएगा, जब उसकी किस्त 90 दिनों से अधिक समय तक बकाया रहेगी। इस फैसले का उद्देश्य लोन की निगरानी को अधिक पारदर्शी और मानकीकृत बनाना है। माना जा रहा है कि इससे बैंकों की बैलेंस शीट और जोखिम प्रबंधन में सुधार होगा।
इस नियम को लागू करने में Reserve Bank of India की अहम भूमिका रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग मानकों के अनुरूप है और इससे वित्तीय प्रणाली की स्थिरता मजबूत होगी। साथ ही, इससे बैंकों को खराब कर्ज की पहचान करने और समय रहते कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।
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विशेषज्ञों के मुताबिक इस बदलाव का असर उधार लेने वालों और बैंकों दोनों पर पड़ेगा। जहां एक ओर बैंकों को जोखिम कम करने में मदद मिलेगी, वहीं ग्राहकों के लिए समय पर किस्त चुकाना और भी जरूरी हो जाएगा। माना जा रहा है कि इस कदम से भारत के बैंकिंग सेक्टर की सेहत लंबी अवधि में बेहतर होगी।





