Abhijeet Deepke को बड़ी राहत, सशर्त जमानत से खुला रिहाई का रास्ता; दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल
दिल्ली में प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके को अदालत से राहत मिल गई है। विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की अदालत ने उन्हें सशर्त जमानत देते हुए शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के बाद रिहा करने का आदेश दिया है। यह घटनाक्रम राजधानी में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की एहतियाती कार्रवाई और नागरिकों के अधिकारों को लेकर बहस को फिर चर्चा में ले आया है।
Abhijeet Deepke Bail: बॉन्ड भरने के बाद होगी रिहाई
अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने शांति भंग होने की आशंका के आधार पर हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार, दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत हिरासत से संबंधित औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत नया मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की गई।
इसके बाद उन्हें शनिवार को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने मामले पर विचार करने के बाद सशर्त जमानत दे दी। आदेश के अनुसार, निर्धारित बॉन्ड भरने और संबंधित औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ होगा।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। सशर्त जमानत का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने मामले को पूरी तरह समाप्त कर दिया है या पुलिस की कार्रवाई को अवैध घोषित कर दिया है। इसका मतलब है कि निर्धारित शर्तों का पालन करते हुए व्यक्ति को हिरासत से बाहर आने की अनुमति दी जा सकती है।
पहले भी हिरासत में लिए जाने से बढ़ा मामला
अभिजीत दीपके इससे पहले 10 अक्टूबर को दिल्ली एयरपोर्ट पर भी हिरासत में लिए गए थे। उस समय भी शांति बनाए रखने से संबंधित एक अलग मामला दर्ज किया गया था और उनसे एक साल तक शांति बनाए रखने के मुचलके पर हस्ताक्षर कराए गए थे।
लगातार हुई इन कार्रवाइयों के कारण मामला केवल एक हिरासत तक सीमित नहीं रह गया है। अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि अलग-अलग मौकों पर पुलिस ने किन परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों मामलों में पुलिस की कार्रवाई गैर-कानूनी थी। इसके लिए संबंधित आदेशों, दर्ज मामलों और परिस्थितियों का परीक्षण जरूरी होगा।
नेहा बोरा की रिहाई के बाद पुलिस पर सवाल
इस घटनाक्रम में नेहा बोरा का मामला भी चर्चा में आया है। उन्हें भी पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया। रिहाई के बाद बोरा ने दिल्ली पुलिस और केंद्र की भाजपा सरकार की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया।
बोरा के मुताबिक, उन्हें मंडी हाउस से हिरासत में लेकर सुबह पांच बजे तक थाने में रखा गया। उन्होंने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लोगों को हिरासत में लेने की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप होनी चाहिए।
ये आरोप बोरा के बयान हैं। उनकी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पुलिस पक्ष के विस्तृत स्पष्टीकरण के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। फिर भी, ऐसे आरोप हिरासत की प्रक्रिया, उसके आधार और नागरिकों को उपलब्ध कानूनी उपायों पर सार्वजनिक चर्चा की जरूरत को रेखांकित करते हैं।
एहतियाती हिरासत और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन क्यों जरूरी?
कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। यदि किसी कार्यक्रम से हिंसा या शांति भंग होने की वास्तविक आशंका हो, तो कानून के तहत निवारक कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन ऐसी कार्रवाई का आधार केवल आशंका का सामान्य उल्लेख नहीं होना चाहिए; उसे लागू कानूनी प्रावधानों और संबंधित परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा संबंधी कार्यवाही से जुड़ी है, जबकि धारा 170 कुछ परिस्थितियों में संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए गिरफ्तारी की शक्ति प्रदान करती है। इन प्रावधानों का उद्देश्य संभावित अपराधों को रोकना है, न कि शांतिपूर्ण असहमति को दंडित करना।
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। किसी मार्च या सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले पुलिस की कार्रवाई का मूल्यांकन करते समय यह देखना जरूरी होता है कि खतरे का आधार क्या था, कार्रवाई आवश्यक और अनुपातिक थी या नहीं तथा हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के तहत उचित अवसर मिला या नहीं।
आगे क्या होगा?
अभिजीत दीपके की रिहाई निर्धारित बॉन्ड और अन्य औपचारिकताओं पर निर्भर करेगी। दूसरी ओर, हिरासत की परिस्थितियों और पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठे सवालों का स्पष्ट जवाब संबंधित रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया से ही मिल सकता है।
इस घटनाक्रम का व्यापक महत्व इसलिए है क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक सुरक्षा और शांतिपूर्ण विरोध, दोनों की अहमियत है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल भी कानून की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
अदालत से मिली राहत फिलहाल अभिजीत दीपके के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। आगे इस मामले की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित कानूनी प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है और हिरासत से जुड़े विवादों पर क्या तथ्य सामने आते हैं।




