सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा कि केवल न्यायाधीश बदल जाने से किसी फैसले को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायालय व्यक्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और संस्थागत प्रक्रिया के अनुसार काम करता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने जोर देकर कहा कि किसी मामले की सुनवाई के दौरान जज के स्थानांतरण या अवकाश जैसी परिस्थितियाँ न्यायिक निर्णय को प्रभावित नहीं करतीं। अदालत के आदेश एक संस्थागत निर्णय होते हैं और इन्हें केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि फैसला सुनाने वाला न्यायाधीश बदल गया है।उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रणाली का आधार निरंतरता, निष्पक्षता और सिद्धांतों पर आधारित प्रक्रिया है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना के अनुसार, यदि हर बार जज बदलने पर सुनवाई फिर से शुरू की जाए या फैसला खारिज कर दिया जाए, तो न्यायिक प्रक्रिया अत्यधिक धीमी हो जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह चलन अदालतों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा और न्याय मिलने में अनावश्यक विलंब का कारण बनेगा।
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कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायमूर्ति नागरत्ना का यह बयान न्यायिक ढांचे की निरंतरता और पारदर्शिता को मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि निर्णय अदालत का होता है, न कि किसी एक न्यायाधीश का व्यक्तिगत विचार।





