Kerala विवाद पर अभिजीत दीपके का बड़ा हमला! चुनावी निष्पक्षता के मुद्दे पर कांग्रेस भी सवालों के घेरे में
केरल की राजनीति में चुनावी निष्पक्षता को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। कोच्चि में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके ने ऐसा बयान दिया, जिसने कांग्रेस सरकार के एक पुराने प्रशासनिक फैसले को फिर चर्चा में ला दिया। उनका सवाल केवल केरल तक सीमित नहीं था, बल्कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और राजनीतिक सत्ता के साथ प्रशासनिक पदों के संबंधों पर भी केंद्रित था।
दरअसल, केरल में पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) डॉ. रतन यू. केलकर को मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का सचिव नियुक्त किए जाने के फैसले पर पहले भी राजनीतिक विवाद हो चुका है। अब इस नियुक्ति को लेकर अभिजीत दीपके की टिप्पणी ने कांग्रेस के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी है।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर क्यों उठ रहे सवाल?
कोच्चि में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित प्रदर्शन को ‘जंतर-मंतर @ कोच्चि’ नाम दिया गया। इस कार्यक्रम में प्रकाश राज और अभिजीत दीपके सहित कई चर्चित चेहरे शामिल हुए। प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना था।
इसी दौरान अभिजीत दीपके से केरल सरकार के प्रशासनिक फैसले पर सवाल किया गया। उन्होंने कहा कि चुनाव व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर ऐसी परिस्थितियां नहीं बननी चाहिए, जिनसे निष्पक्षता पर संदेह पैदा हो।
उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए भी राजनीतिक दलों के दोहरे रवैये की ओर इशारा किया। उनका तर्क था कि जब चुनावी संस्थाओं की स्वतंत्रता की बात हो, तो राजनीतिक सुविधा के अनुसार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मानक नहीं अपनाए जाने चाहिए।
केरल में पूर्व CEO की नियुक्ति क्यों बनी राजनीतिक मुद्दा?
इस विवाद की पृष्ठभूमि में केरल सरकार का वह फैसला है, जिसके तहत पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी और 2003 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. रतन यू. केलकर को मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त किया गया था।
इस नियुक्ति पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे। सीपीआईएम, सीपीआई और भाजपा ने नियुक्ति की टाइमिंग और उसके प्रशासनिक प्रभाव को लेकर आपत्ति जताई थी।
राजनीतिक विवाद का मुख्य आधार यह था कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े वरिष्ठ पद पर काम कर चुके अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय में जिम्मेदारी दिए जाने से संस्थागत निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, किसी अधिकारी की नियुक्ति अपने आप में अनियमितता या पक्षपात का प्रमाण नहीं होती। इसके लिए नियुक्ति के नियम, संबंधित अधिकारी की भूमिका, लागू सेवा शर्तों और संभावित हितों के टकराव की वास्तविक स्थिति को देखना जरूरी है।
SIR और वोट कटने के आरोपों पर क्या बोले अभिजीत दीपके?
प्रदर्शन के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे। जब अभिजीत दीपके से पूछा गया कि क्या केरल में भी वोट चोरी हुई है, तो उन्होंने दावा किया कि पूरे देश में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और ऐसा कोई राज्य नहीं है जहां वोट डिलीट नहीं हो रहे हों।
यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। मतदाता सूची से नाम हटना और जानबूझकर वोट चोरी होना दो अलग-अलग बातें हैं।
SIR के दौरान मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके नागरिकों और डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान के कारण नाम हटाए जा सकते हैं। लेकिन यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटता है, तो यह उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए किसी भी राज्य में नाम हटाए जाने के आंकड़ों के साथ यह देखना भी जरूरी है कि कितने लोगों के नाम गलत तरीके से हटे, कितनी आपत्तियां दर्ज हुईं और कितने मामलों में सुधार किया गया। केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर पूरी प्रक्रिया को सही या गलत ठहराना उचित नहीं होगा।
कांग्रेस के सामने राजनीतिक विरोधाभास की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता है। जब कोई पार्टी सत्ता से बाहर होती है, तब चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना आसान होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही पार्टी संस्थागत निष्पक्षता और पारदर्शिता के सवालों का सामना कैसे करती है, यह उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बन जाता है।
केरल में कांग्रेस की जीत के बाद पूर्व CEO की नियुक्ति को लेकर उठे सवालों ने इसी बहस को तेज किया है। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी संस्थाओं से जुड़े मामलों में सभी राजनीतिक दलों को समान मानक अपनाने चाहिए।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थानों की स्वतंत्रता पर बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नियुक्तियों की पारदर्शिता, अधिकारियों की जवाबदेही और मतदाता सूची में सुधार की निष्पक्ष प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।
आगे क्या होगा?
कोच्चि का यह प्रदर्शन एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका, SIR प्रक्रिया और राजनीतिक नियुक्तियों की पारदर्शिता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला सकता है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ प्रशासनिक फैसलों और चुनावी प्रक्रिया की जवाबदेही पर भी चर्चा बढ़ने की संभावना है।
लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं है, बल्कि जनता के भरोसे की व्यवस्था भी है। इसलिए चुनावी संस्थाओं पर सवाल उठने पर उनका जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच के जरिए मिलना चाहिए।
Kerala चुनावी विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखा है—क्या राजनीतिक दल चुनावी निष्पक्षता के सिद्धांतों को हर राज्य और हर परिस्थिति में समान रूप से लागू करने के लिए तैयार हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी बात पर निर्भर करती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए एक जैसे संस्थागत मानक कायम रहें।




