Bastar Wildlife Crisis: नक्सली खौफ घटते ही इंद्रावती के जंगलों में बढ़ा खूनी खतरा, बाघ-पैंगोलिन पर शिकारियों की नजर
छत्तीसगढ़ बिलासपुर-कोलकाता फ्लाइट शुरू होते ही फिर बंद हुई।
- 42 बुकिंग के बाद भी विमान ने नहीं भरी उड़ान।
- बिलासपुर के यात्रियों के साथ यह कैसा बड़ा मजाक?
- एक दिन चली फ्लाइट, दूसरे दिन सेवा पूरी ठप।
- एयरपोर्ट और एविएशन विभाग के बयानों में भारी उलझन।
के बस्तर में जंगलों की बदलती परिस्थितियों ने वन्यजीव संरक्षण के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। जिन जंगलों में कभी नक्सली गतिविधियों के कारण आम लोगों और बाहरी लोगों का पहुंचना मुश्किल था, वहां अब आवाजाही बढ़ रही है। लेकिन इस बदलाव का एक चिंताजनक पहलू भी सामने आया है। जंगलों तक आसान पहुंच का फायदा वन्यजीव तस्कर और अवैध शिकारी उठाने लगे हैं।
बीजापुर में बाघ के शिकार और तेंदुए की खाल की तस्करी के मामलों के बाद अब पैंगोलिन के अवैध कारोबार ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। सवाल यह है कि जब जंगलों में इंसानी गतिविधियां बढ़ रही हैं, तब वहां रहने वाले दुर्लभ वन्यजीवों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?
Indravati National Park: जंगलों में बढ़ती पहुंच बनी वन्यजीवों के लिए मुसीबत
बस्तर का इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां घने जंगल, प्राकृतिक जलस्रोत और वन्यजीवों के अनुकूल वातावरण कई दुर्लभ प्रजातियों को आश्रय देते हैं।
लंबे समय तक नक्सल प्रभावित रहने के कारण इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां सीमित थीं। सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के चलते वन विभाग की नियमित निगरानी भी कई इलाकों में कठिन रही। हालांकि, इंसानी आवाजाही कम होने का एक अप्रत्यक्ष प्रभाव यह था कि जंगल के कई हिस्से शिकारियों और बाहरी हस्तक्षेप से अपेक्षाकृत दूर रहे।
अब परिस्थितियां बदल रही हैं। सुरक्षा व्यवस्था में सुधार और आवाजाही बढ़ने के साथ जंगलों तक पहुंच आसान हो रही है। यह स्थानीय विकास और सामान्य जनजीवन के लिए सकारात्मक बदलाव है, लेकिन वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से इसके साथ नई जिम्मेदारियां भी जुड़ गई हैं।
Pangolin Smuggling: 14 किलो शल्क की बरामदगी ने बढ़ाई चिंता
दंतेवाड़ा के गीदम में पैंगोलिन के शल्क की बरामदगी ने वन्यजीव तस्करी के नेटवर्क की गंभीरता उजागर की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कार्रवाई के दौरान करीब 14 किलोग्राम शल्क जब्त किए गए और छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
प्रारंभिक अनुमान है कि इस बरामदगी के पीछे छह से अधिक पैंगोलिन का शिकार हो सकता है। गिरफ्तार आरोपियों में पांच बीजापुर जिले के निवासी बताए गए हैं।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पैंगोलिन दुनिया के सबसे अधिक अवैध वन्यजीव व्यापार का सामना करने वाले स्तनधारियों में शामिल है। इसके शरीर पर मौजूद केराटिन के शल्कों की अवैध बाजार में मांग रहती है। केराटिन वही पदार्थ है जिससे मनुष्य के नाखून और बाल भी बने होते हैं।
इसका मतलब है कि एक ऐसे जीव का शिकार किया जा रहा है जिसकी पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका है, जबकि उसके शल्कों के लिए किए जाने वाले व्यापार का कोई वैज्ञानिक औचित्य नहीं है।
Tiger और Leopard के बाद पैंगोलिन पर खतरा क्यों गंभीर है?
बाघ और तेंदुए जैसे बड़े वन्यजीवों का शिकार अक्सर सुर्खियां बनता है, लेकिन पैंगोलिन का अवैध शिकार अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। यही वजह है कि इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
पैंगोलिन मुख्य रूप से चींटियों और दीमकों को खाता है। इस तरह वह जंगलों में कीटों की आबादी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखने में योगदान देता है।
यदि किसी क्षेत्र में इनकी संख्या लगातार घटती है, तो इसका असर स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। इसके अलावा, पैंगोलिन की प्रजनन दर भी अपेक्षाकृत धीमी होती है। इसलिए लगातार शिकार होने पर इसकी आबादी को दोबारा सामान्य स्तर पर लाना आसान नहीं होता।
बाघ और तेंदुए जैसे बड़े जीवों के शिकार के मामले भी यही संकेत देते हैं कि समस्या केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं है। जंगल के अलग-अलग स्तरों पर रहने वाले वन्यजीव अवैध शिकार के दबाव का सामना कर रहे हैं।
नक्सलवाद में कमी के बाद वन विभाग के सामने नई परीक्षा
इंद्रावती जैसे विशाल और दुर्गम जंगलों में निगरानी करना अपने आप में कठिन काम है। लंबे समय तक सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों ने वन विभाग की गश्त और नियमित निरीक्षण को प्रभावित किया।
अब जब जंगलों तक पहुंच बढ़ रही है, तो संरक्षण व्यवस्था को भी उसी गति से मजबूत करना होगा।
सिर्फ कभी-कभार छापेमारी या गिरफ्तारी से वन्यजीव तस्करी पर स्थायी रोक लगाना मुश्किल होगा। इसके पीछे काम करने वाले पूरे नेटवर्क को समझना जरूरी है। शिकार करने वाले व्यक्ति, अवैध खरीददार, परिवहन करने वाले लोग और अंतिम बाजार तक पहुंचाने वाले बिचौलिये एक संगठित श्रृंखला का हिस्सा हो सकते हैं।
इसलिए कार्रवाई का दायरा केवल जंगल में शिकार करने वालों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
क्या पर्यटन बढ़ने से भी वन्यजीवों पर दबाव पड़ेगा?
बस्तर में पर्यटन की संभावनाएं बढ़ने के साथ इंद्रावती क्षेत्र में सफारी और अन्य पर्यटन गतिविधियों को लेकर भी चर्चा हो रही है। पर्यटन स्थानीय रोजगार, परिवहन और छोटे कारोबार के लिए अवसर पैदा कर सकता है।
लेकिन पर्यटन शुरू करने से पहले कुछ बुनियादी व्यवस्थाएं जरूरी हैं।
- संवेदनशील वन क्षेत्रों में नियमित गश्त और निगरानी बढ़ाई जाए।
- कैमरा ट्रैप और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए।
- वन्यजीवों की आवाजाही वाले रास्तों की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाए।
- स्थानीय ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण अभियान से जोड़ा जाए।
- अवैध शिकार और तस्करी की सूचना देने वालों की पहचान सुरक्षित रखी जाए।
- पर्यटन गतिविधियों को वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास से दूर और नियंत्रित रखा जाए।
विशेषज्ञों के नजरिये से देखें तो संरक्षण और पर्यटन को एक-दूसरे का विरोधी बनाने के बजाय वैज्ञानिक योजना के तहत साथ लेकर चलना अधिक उपयोगी होगा।
स्थानीय ग्रामीण बन सकते हैं जंगलों की सबसे मजबूत सुरक्षा दीवार
इंद्रावती के जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की सबसे अच्छी स्थानीय जानकारी होती है। वे जंगल में होने वाली असामान्य गतिविधियों को जल्दी पहचान सकते हैं।
यदि वन विभाग स्थानीय समुदायों को रोजगार, जागरूकता और संरक्षण कार्यक्रमों से जोड़े, तो अवैध शिकार के खिलाफ मजबूत स्थानीय नेटवर्क तैयार किया जा सकता है।
इसके लिए ग्रामीणों को केवल निगरानी की जिम्मेदारी देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें संरक्षण के लाभों में भागीदारी और प्रशासन से भरोसेमंद सहयोग भी मिलना चाहिए।
बस्तर के जंगलों का भविष्य अब संरक्षण व्यवस्था पर निर्भर
इंद्रावती के जंगलों में बदलती परिस्थितियां एक महत्वपूर्ण संदेश दे रही हैं। किसी क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति सुधरना विकास की दिशा में जरूरी कदम है, लेकिन उसके साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
बाघ, तेंदुआ और पैंगोलिन केवल जंगल की शोभा नहीं हैं, बल्कि एक बड़े प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा हैं। इनका नुकसान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपूरणीय क्षति बन सकता है।
अब चुनौती यह है कि बस्तर के जंगलों को इंसानी आवाजाही और विकास के लिए खोलते समय उन्हें शिकारियों के लिए आसान रास्ता न बनने दिया जाए। नक्सली प्रभाव में कमी के बाद इंद्रावती को एक नए दौर में प्रवेश करना है, जहां जंगल की असली पहचान उसके सुरक्षित वन्यजीवों और समृद्ध जैव विविधता से होनी चाहिए।




