Kharsia Hospital Case: इलाज के दौरान युवक की मौत का गंभीर मामला, 4 महीने से मृत्यु प्रमाण-पत्र के लिए भटक रहा परिवार
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के खरसिया में एक युवक की अस्पताल में मौत के मामले ने चिकित्सा व्यवस्था की जवाबदेही और सरकारी दस्तावेज हासिल करने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पाइल्स के ऑपरेशन के लिए सिविल अस्पताल में भर्ती 27 वर्षीय तामेश्वर शर्मा उर्फ पदुम शर्मा की 25 जून को मौत हो गई थी। अब घटना के करीब चार महीने बाद भी परिजनों का कहना है कि उन्हें मृत्यु प्रमाण-पत्र नहीं मिला है।
परिवार ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कलेक्टर से हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी मांग है कि मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी कराया जाए और जांच में जिम्मेदारी सामने आने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। हालांकि, इलाज में लापरवाही के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के निष्कर्ष अभी सामने नहीं आए हैं।
ऑपरेशन के बाद दूसरे अस्पताल ले जाने की क्या थी वजह?
मृतक के पिता रावेन्द्र शर्मा, निवासी पुरानी बस्ती, वार्ड नंबर 7 खरसिया ने अपने आवेदन में बताया कि उनके बेटे को पाइल्स के ऑपरेशन के लिए सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिता का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ नर्स की भूमिका रही और इसी दौरान उनके बेटे की मौत हो गई।
परिवार के अनुसार, युवक को बाद में मेट्रो अस्पताल रेफर किया गया, जहां जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद परिजन शव लेकर खरसिया लौट आए।
इस घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह है कि ऑपरेशन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, मरीज की हालत कब बिगड़ी और उसे दूसरे अस्पताल भेजने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया। इन सवालों का उत्तर अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड, ऑपरेशन से संबंधित दस्तावेजों, रेफरल नोट और मेडिकल जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।
चार महीने बाद भी मृत्यु प्रमाण-पत्र नहीं मिलने से बढ़ी परेशानी
किसी परिवार के लिए मृत्यु के बाद जरूरी दस्तावेज हासिल करना केवल औपचारिकता नहीं होता। मृत्यु प्रमाण-पत्र बैंक खातों, बीमा दावों, संपत्ति से जुड़े मामलों और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में आवश्यक हो सकता है। ऐसे में दस्तावेज मिलने में देरी शोकग्रस्त परिवार की मुश्किलें और बढ़ा सकती है।
रावेन्द्र शर्मा का कहना है कि वह इस मामले में पहले भी शिकायत कर चुके हैं। परिवार ने खरसिया चौकी में शिकायत देने और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में मामला उठाने की बात भी कही है। उनके मुताबिक, अब तक उन्हें अपेक्षित समाधान नहीं मिला है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में प्रमाण-पत्र जारी न होने का आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं है। यह जानना जरूरी होगा कि मृत्यु का पंजीकरण हुआ है या नहीं, आवेदन किस स्तर पर लंबित है और संबंधित विभाग ने कोई आपत्ति या अतिरिक्त दस्तावेज मांगे हैं या नहीं।
इलाज में लापरवाही के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी
अस्पताल में किसी मरीज की मौत अपने आप में चिकित्सकीय लापरवाही का प्रमाण नहीं होती। किसी भी ऑपरेशन में जोखिम हो सकते हैं, लेकिन यदि परिजन लापरवाही का आरोप लगाते हैं, तो शिकायत की निष्पक्ष और दस्तावेज-आधारित जांच होना जरूरी है।
इस मामले में जांच के दौरान मरीज की भर्ती से लेकर ऑपरेशन, उपचार, हालत में बदलाव और रेफरल तक की पूरी समयरेखा की समीक्षा की जा सकती है। यह भी देखा जाना चाहिए कि उपचार के दौरान जरूरी चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं और मरीज की स्थिति से जुड़े सभी निर्णय रिकॉर्ड में दर्ज हैं या नहीं।
यदि जांच में लापरवाही या किसी अन्य प्रकार की जिम्मेदारी सामने आती है, तो संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, निष्कर्ष आने से पहले किसी डॉक्टर या अस्पताल कर्मचारी को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
प्रशासन के सामने दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां
परिवार ने कलेक्टर से मृत्यु प्रमाण-पत्र दिलाने और जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की है। प्रशासन के सामने इस मामले में दो अलग-अलग पहलुओं पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है—पहला, आवश्यक दस्तावेज जारी करने की प्रक्रिया में आ रही बाधा को स्पष्ट करना; दूसरा, मृत्यु की परिस्थितियों और लगाए गए आरोपों की उचित जांच सुनिश्चित करना।
मृत्यु प्रमाण-पत्र से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया और कथित चिकित्सकीय लापरवाही की जांच अलग विषय हैं। इसलिए एक प्रक्रिया लंबित होने के कारण दूसरी शिकायत की जांच प्रभावित नहीं होनी चाहिए। संबंधित अधिकारियों को परिवार को यह बताना चाहिए कि आवेदन की स्थिति क्या है और आगे किस प्रक्रिया का पालन किया जाना है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही का सवाल
सरकारी अस्पतालों पर बड़ी संख्या में मरीज निर्भर रहते हैं। ऐसे में उपचार की गुणवत्ता के साथ-साथ रिकॉर्ड का सही रखरखाव, मरीज की स्थिति के बारे में परिजनों को जानकारी और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई भी स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
खरसिया का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक परिवार मृत्यु के कारणों पर सवाल उठा रहा है और साथ ही जरूरी दस्तावेज के लिए भी इंतजार करने की बात कह रहा है। पारदर्शी जांच से न केवल परिवार की शिकायतों पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है, बल्कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों में अस्पतालों और प्रशासन की प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के अवसर भी मिल सकते हैं।
फिलहाल परिवार ने कलेक्टर से हस्तक्षेप की मांग की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मृत्यु प्रमाण-पत्र के लंबित रहने का कारण क्या है और युवक की मौत से जुड़े आरोपों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।




