Meerut News: फांसी की सजा को बड़ी चुनौती, मुस्कान और साहिल की हाईकोर्ट में अपील
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में अब कानूनी लड़ाई एक नए चरण में पहुंच गई है। जिला अदालत से मौत की सजा पाए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी है। उनकी अपील में जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों, बरामदगी की प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए गए हैं।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अब हाईकोर्ट के सामने केवल सजा की गंभीरता का प्रश्न नहीं होगा, बल्कि यह भी परखा जाएगा कि निचली अदालत का फैसला कानून और उपलब्ध साक्ष्यों की कसौटी पर कितना टिकता है।
हाईकोर्ट में किन आधारों पर दी गई चुनौती?
अपीलकर्ताओं का तर्क है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। उनका कहना है कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और इन साक्ष्यों का मूल्यांकन करते समय कथित विरोधाभासों तथा कानूनी प्रक्रियाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
अपील में हथियार, सीमेंट और ड्रम की खरीद से जुड़े बयानों पर सवाल उठाए गए हैं। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया है कि खरीद से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और रसीदें प्रस्तुत नहीं की गईं। इसके अतिरिक्त, बरामदगी के दस्तावेजों पर स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर, वीडियोग्राफी की प्रक्रिया और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए आवश्यक प्रमाणपत्रों को लेकर भी आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अपील में बचाव पक्ष की ओर से उठाए गए तर्क हैं। इन पर हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष अभी सामने आना बाकी है। केवल अपील दाखिल होने से न तो पहले का फैसला अपने आप रद्द होता है और न ही दोषसिद्धि समाप्त हो जाती है।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य वाले मामलों में क्या देखती है अदालत?
इस मामले की कानूनी अहमियत समझने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की भूमिका को जानना जरूरी है। ऐसे मामलों में फैसला किसी एक प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर ही निर्भर नहीं होता। घटनाक्रम, भौतिक साक्ष्य, गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितियों को एक साथ देखकर अदालत यह तय करती है कि अभियोजन की कहानी कानूनी मानकों पर खरी उतरती है या नहीं।
बचाव पक्ष की आपत्तियां अब इस बात की न्यायिक जांच का हिस्सा बनेंगी कि साक्ष्य किस तरह जुटाए गए, उनका दस्तावेजीकरण सही था या नहीं और वे आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं। हालांकि, किसी दस्तावेज में कथित कमी या किसी गवाह के बयान में अंतर अपने आप पूरे मामले को कमजोर साबित नहीं करता। उसका महत्व मामले के बाकी साक्ष्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों के साथ मिलाकर तय किया जाता है।
यही कारण है कि अपील की सुनवाई इस प्रकरण का महत्वपूर्ण चरण है। हाईकोर्ट को रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के तर्कों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
जिला अदालत ने कब सुनाई थी मौत की सजा?
मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर 2026 को अदालत ने मामले को विरल से विरलतम श्रेणी का मानते हुए दोनों को मृत्युदंड सुनाया। दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। साक्ष्य मिटाने से जुड़े आरोप में भी सजा सुनाई गई थी।
दोषसिद्धि भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के साथ धारा 3(5) और धारा 238(ए) के तहत की गई थी। अब अपील में दोनों ने दोषसिद्धि और सजा निरस्त करने तथा आरोपों से बरी किए जाने की मांग की है।
मृत्युदंड के मामलों में अपीलीय न्यायिक समीक्षा का विशेष महत्व होता है। इस स्तर पर अदालत को निचली अदालत के निष्कर्षों और सजा से जुड़े कानूनी पहलुओं की जांच करनी होती है। इसलिए अपील का दाखिल होना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि पहले फैसले के सही या गलत होने का अपने आप प्रमाण।
क्या है नीला ड्रम हत्याकांड?
यह मामला मेरठ के ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र में सौरभ राजपूत की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, हत्या के बाद शव को नीले प्लास्टिक ड्रम में रखकर सीमेंट और कंक्रीट की मदद से छिपाने का प्रयास किया गया था। मामले के सामने आने के बाद इसकी व्यापक चर्चा हुई और पुलिस जांच के बाद मुस्कान रस्तोगी तथा साहिल शुक्ला को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जिला अदालत में मुकदमा चला।
इस प्रकरण ने गंभीर अपराधों की जांच में भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण, घटनास्थल की जांच और दस्तावेजी प्रक्रिया की अहमियत को भी सामने रखा है। ऐसे मामलों में जांच की गुणवत्ता केवल आरोपियों तक पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि अदालत में आरोपों को कानूनी रूप से साबित करने के लिए भी निर्णायक होती है।
अब आगे क्या होगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के तर्कों के साथ अभियोजन पक्ष का जवाब और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का परीक्षण महत्वपूर्ण रहेगा। अदालत उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह तय करेगी कि दोषसिद्धि और सजा के संबंध में क्या कानूनी निष्कर्ष निकलता है।
फिलहाल अपील में उठाए गए सवालों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इस मामले में आगे की कार्यवाही यह स्पष्ट करेगी कि निचली अदालत का फैसला बरकरार रहता है, उसमें कोई बदलाव होता है या अदालत कानून के अनुसार कोई अन्य आदेश देती है।
सौरभ राजपूत हत्याकांड अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां जनचर्चा से अधिक महत्व अदालत में प्रस्तुत तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी दलीलों का होगा। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।




