Rural Employment: ग्रामीण रोजगार पर बड़ा बदलाव, 125 दिन की गारंटी से बढ़ी उम्मीदें; आदिवासियों के 50 अतिरिक्त दिनों पर सवाल
ग्रामीण भारत में मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए रोजगार की गारंटी सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि साल भर के घरेलू बजट और आर्थिक सुरक्षा का अहम आधार है। मनरेगा की जगह नए ग्रामीण रोजगार कानून के लागू होने के बाद रोजगार की न्यूनतम गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने की बात सामने आई है। इससे ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त काम मिलने की उम्मीद है। लेकिन वन अधिकार अधिनियम के तहत जमीन का अधिकार पाने वाले कुछ पात्र आदिवासी परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या उन्हें पहले की तरह 50 दिन का अतिरिक्त रोजगार भी मिलेगा?
100 से 125 दिन: बदलाव का ग्रामीण परिवारों पर क्या असर पड़ेगा?
मनरेगा के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी दी जाती थी। नए कानून, विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 के तहत यह गारंटी बढ़ाकर 125 दिन किए जाने की जानकारी दी गई है।
इस बदलाव का सीधा महत्व उन परिवारों के लिए है, जिनकी आय खेती के मौसम, स्थानीय मजदूरी और अस्थायी काम पर निर्भर रहती है। यदि रोजगार की बढ़ी हुई गारंटी के तहत उन्हें वास्तव में अतिरिक्त काम मिलता है, तो इससे खाद्यान्न, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और रोजमर्रा के खर्चों को संभालने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, रोजगार के गारंटीशुदा दिनों में वृद्धि और वास्तव में उपलब्ध कराए गए काम के दिनों में अंतर समझना जरूरी है। योजना का लाभ तभी प्रभावी होगा, जब पात्र परिवारों को समय पर काम मिले, मजदूरी का भुगतान हो और शिकायतों का समाधान किया जाए।
आदिवासी परिवारों के लिए 150 दिनों का सवाल क्यों अहम है?
इस पूरे बदलाव का सबसे संवेदनशील पहलू वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत भूमि अधिकार पाने वाले कुछ अनुसूचित जनजाति परिवारों से जुड़ा है।
जनवरी 2014 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए थे कि निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले कुछ आदिवासी परिवारों को मनरेगा के 100 दिनों के अतिरिक्त 50 दिन का मजदूरी रोजगार दिया जाए। यह सुविधा उन पात्र परिवारों के लिए थी, जिन्हें वन अधिकार कानून के तहत जमीन मिली थी और जिनके पास उस जमीन के अलावा दूसरी निजी भूमि नहीं थी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे परिवारों की आजीविका को सहारा देना था, जिनकी आर्थिक स्थिति और रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं।
अब जब रोजगार की सामान्य गारंटी 125 दिन हो गई है, तो यह स्पष्ट होना जरूरी है कि इन पात्र परिवारों के लिए अतिरिक्त 50 दिनों की व्यवस्था जारी है या नहीं। यदि पुरानी सुविधा नए कानून के तहत भी लागू रहती है, तो कुल संभावित रोजगार 175 दिन तक हो सकता है। लेकिन इसे मौजूदा अधिकार मानकर चलना उचित नहीं होगा, क्योंकि नए कानून में अतिरिक्त 50 दिनों की सुविधा का स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध विवरण में नहीं है।
नए कानून की धारा 5 क्या संकेत देती है?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नए ग्रामीण रोजगार कानून की धारा 5 पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के रोजगार की गारंटी देती है। लेकिन वन अधिकार धारकों के लिए पहले उपलब्ध अतिरिक्त 50 दिनों के रोजगार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
यहां कानूनी व्याख्या का महत्व बढ़ जाता है। किसी पुराने सरकारी निर्देश का भविष्य में लागू रहना इस बात पर निर्भर कर सकता है कि नया कानून उस व्यवस्था को सुरक्षित रखता है या नहीं, उसके अंतर्गत बनाए गए नियम क्या कहते हैं और संबंधित प्रशासनिक निर्देश किस स्थिति में हैं।
इसलिए केवल नए कानून में अतिरिक्त 50 दिनों का उल्लेख नहीं होने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पुरानी सुविधा समाप्त हो गई है। इसी तरह, यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि वह बिना किसी बदलाव के जारी रहेगी।
इस प्रश्न पर केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की जरूरत है, ताकि राज्यों, पंचायतों और पात्र परिवारों के बीच भ्रम न रहे।
रोजगार के दिनों से आगे भी है आजीविका का सवाल
ग्रामीण रोजगार कानून की सफलता को केवल 100 से 125 दिनों की बढ़ोतरी के आधार पर नहीं परखा जा सकता। असली कसौटी यह होगी कि कितने परिवारों को काम मिला, कितने दिनों तक मिला और मजदूरी कितनी समयबद्ध तरीके से उनके खातों तक पहुंची।
वन अधिकार धारक परिवारों के मामले में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके लिए जमीन का अधिकार और मजदूरी आधारित रोजगार एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। जमीन से आजीविका के साधन विकसित होने में समय लगता है, जबकि मजदूरी रोजगार तत्काल घरेलू खर्चों को पूरा करने में मदद कर सकता है।
यदि अतिरिक्त रोजगार की पुरानी सुविधा पर स्पष्टता नहीं आती, तो पात्र परिवारों के लिए अपनी सालाना आय और काम की उपलब्धता का अनुमान लगाना कठिन हो सकता है। इसका असर स्थानीय रोजगार मांग, पंचायतों की योजना और सरकारी बजट के उपयोग पर भी पड़ सकता है।
सरकार को किन मुद्दों पर स्पष्टता देनी चाहिए?
इस बदलाव के बाद सबसे जरूरी है कि पात्रता और रोजगार के दिनों से जुड़े नियम सरल भाषा में सार्वजनिक किए जाएं। विशेष रूप से यह बताया जाना चाहिए कि वन अधिकार अधिनियम के तहत भूमि अधिकार प्राप्त करने वाले किन परिवारों को अतिरिक्त रोजगार का लाभ मिल सकता है और नए कानून में उनकी स्थिति क्या होगी।
राज्यों और पंचायतों को भी स्पष्ट निर्देश मिलने चाहिए, ताकि एक ही श्रेणी के परिवारों को अलग-अलग जगहों पर अलग जानकारी न मिले। साथ ही, काम की मांग दर्ज करने, रोजगार उपलब्ध कराने और मजदूरी भुगतान की निगरानी की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।
यदि अतिरिक्त 50 दिनों का लाभ जारी है, तो उसके लिए पात्रता और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। यदि व्यवस्था में बदलाव किया गया है, तो उसके कानूनी आधार और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की स्थिति भी सामने रखी जानी चाहिए।
ग्रामीण रोजगार की नई व्यवस्था का असली इम्तिहान
125 दिनों की रोजगार गारंटी ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हो सकती है, लेकिन इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। वहीं, वन अधिकार धारक आदिवासी परिवारों के अतिरिक्त 50 दिनों का सवाल केवल तकनीकी नियमों का विषय नहीं है; यह उनकी आय की सुरक्षा और रोजगार के अवसरों की निरंतरता से जुड़ा है।
अब सरकार की ओर से स्पष्टता मिलने पर ही यह तय हो सकेगा कि पात्र आदिवासी परिवारों के लिए पुराने अतिरिक्त रोजगार प्रावधान का क्या भविष्य होगा। ग्रामीण रोजगार व्यवस्था की विश्वसनीयता इसी में है कि नए लाभों के साथ पहले से उपलब्ध सुविधाओं की स्थिति भी स्पष्ट हो और किसी पात्र परिवार को केवल नियमों की अस्पष्टता के कारण नुकसान न उठाना पड़े।




