दुर्ग में साइबर ठगी पर बड़ा प्रहार! फर्जी बैंक खातों से चल रहा था करोड़ों का खेल, 7 आरोपी गिरफ्तार
दुर्ग। कमीशन के लालच में दिया गया एक बैंक खाता किसी दूसरे व्यक्ति के लिए मुसीबत बन सकता है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में ऑनलाइन सट्टेबाजी और साइबर ठगी के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई ने इसी खतरे को उजागर किया है। सुपेला और खुर्सीपार थाना पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई में सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस की जांच के मुताबिक, संदिग्ध बैंक खातों के जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली रकम को आगे ट्रांसफर किया जा रहा था।
इस मामले का अहम पहलू केवल ऑनलाइन सट्टेबाजी नहीं, बल्कि बैंक खातों के ऐसे नेटवर्क का इस्तेमाल है, जिसके जरिए साइबर अपराध से प्राप्त धन को कई स्तरों पर घुमाया जा सकता है। पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों की संख्या पहले पकड़े गए चार लोगों को मिलाकर अब 11 हो गई है।
साइबर ठगी की रकम कैसे पहुंचती थी दूसरे खातों तक?
पुलिस की जांच में सामने आए कथित तरीके के अनुसार, अलग-अलग लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल रकम प्राप्त करने और उसे आगे भेजने के लिए किया जाता था। खाते में पैसा आने के बाद खाताधारक या बिचौलिये अपना कमीशन काटते और शेष रकम दूसरे खातों में ट्रांसफर कर देते थे।
इस तरह के नेटवर्क में बैंक खाते एक माध्यम की तरह काम करते हैं। ठगी करने वाला व्यक्ति और रकम प्राप्त करने वाला खाताधारक जरूरी नहीं कि एक ही जगह मौजूद हों। कई खातों के बीच लेनदेन होने से पैसे के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी का पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए अधिक जटिल हो सकता है।
खुर्सीपार पुलिस के मामले में गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय समन्वय पोर्टल से मिली जानकारी के आधार पर इंडियन बैंक के 81 संदिग्ध खातों की जांच की जा रही थी। पुलिस के अनुसार, इन खातों में देश के अलग-अलग राज्यों से साइबर ठगी की रकम जमा होने की जानकारी सामने आई थी।
हालांकि, संदिग्ध खातों की संख्या अपने आप में यह साबित नहीं करती कि प्रत्येक खाते से अपराध हुआ है। प्रत्येक खाते के लेनदेन, खाताधारक की भूमिका और रकम के स्रोत की जांच महत्वपूर्ण होगी।
कमीशन के लालच में बैंक खाते देने का आरोप
सुपेला पुलिस को सूचना मिली थी कि दाऊ बाड़ा तालाब के पास दो युवक कथित तौर पर फर्जी बैंक खातों के सौदे में शामिल हैं। इसके बाद कार्रवाई करते हुए नीरज गायकवाड़ और अंशु साव को हिरासत में लिया गया।
पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के दौरान सामने आया कि गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों से आंध्र प्रदेश ग्रामीण बैंक के खाते कम कीमत पर लेकर उन्हें ऑनलाइन सट्टेबाजी से जुड़े गिरोहों को ऊंची रकम पर उपलब्ध कराया जाता था। पुलिस ने बताया कि कुछ खातों को एक लाख रुपये तक में बेचने की बात सामने आई है।
जांच में नीरज गायकवाड़ पर क्यूआर कोड के माध्यम से सट्टे की रकम आगे ट्रांसफर करने का भी आरोप है। पुलिस के अनुसार, इस काम के बदले उसे कथित तौर पर हर महीने 25 हजार रुपये मिलते थे।
ये आरोप जांच का हिस्सा हैं। मामले में प्रत्येक आरोपी की भूमिका और संबंधित लेनदेन का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगा।
खुर्सीपार मामले में पांच और गिरफ्तार
खुर्सीपार पुलिस ने संदिग्ध बैंक खातों के जरिए कथित साइबर ठगी की रकम का लेनदेन करने के मामले में तरुण कुमार, गौरव साहू, जसमीत, निखिल नेताम और नरगिस बानो को गिरफ्तार किया है।
पुलिस ने बताया कि इस कार्रवाई से पहले चार अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका था। इस प्रकार दोनों थाना क्षेत्रों की कार्रवाई में कुल सात नई गिरफ्तारियां हुईं और संबंधित मामलों में गिरफ्तार लोगों की संख्या 11 तक पहुंच गई।
पुलिस ने आरोपियों के पास से चार स्मार्टफोन, एक बैंक पासबुक और तीन एटीएम कार्ड जब्त किए हैं। सभी आरोपियों को न्यायिक रिमांड पर जेल भेजे जाने की जानकारी दी गई है।
बैंक खाता किराए पर देना क्यों बन सकता है गंभीर मुसीबत?
कई लोग अतिरिक्त कमाई या कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड या उससे जुड़ी जानकारी किसी दूसरे व्यक्ति को दे देते हैं। कुछ मामलों में उन्हें बताया जाता है कि खाते का इस्तेमाल सामान्य कारोबारी लेनदेन के लिए होगा। लेकिन यदि खाते में साइबर ठगी से प्राप्त रकम आती है, तो खाताधारक भी जांच के दायरे में आ सकता है।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए: किसी खाते का इस्तेमाल अपराध में होने का मतलब यह नहीं कि खाताधारक हर मामले में जानबूझकर शामिल था। जांच में उसकी जानकारी, मंशा, लेनदेन और भूमिका का आकलन जरूरी है। फिर भी, बिना वैध कारण किसी दूसरे व्यक्ति को अपने खाते का नियंत्रण देना गंभीर वित्तीय और कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है।
खाते से जुड़े लेनदेन का रिकॉर्ड, बैंक की सूचनाएं और डिजिटल साक्ष्य जांच में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए किसी अनजान व्यक्ति को खाता इस्तेमाल करने देना, एटीएम कार्ड सौंपना या ओटीपी साझा करना सुरक्षित नहीं है।
साइबर अपराध के खिलाफ लड़ाई में बैंकिंग नेटवर्क क्यों अहम है?
ऑनलाइन ठगी की रोकथाम केवल फोन नंबर या संदिग्ध वेबसाइट बंद करने तक सीमित नहीं रह सकती। अपराध से प्राप्त रकम किस खाते में गई, वहां से कहां भेजी गई और अंत में किसने निकाली—इन सवालों के जवाब अपराध के पूरे नेटवर्क तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं।
इसी कारण संदिग्ध लेनदेन की पहचान, बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच समन्वय तथा समय रहते शिकायत दर्ज करना महत्वपूर्ण है। यदि रकम कई खातों से गुजर चुकी हो, तो उसका पता लगाने और संभावित रूप से रोकने की प्रक्रिया अधिक कठिन हो सकती है।
दुर्ग की कार्रवाई यह भी दिखाती है कि साइबर अपराध की जांच में स्थानीय स्तर पर पकड़े गए संदिग्धों के साथ-साथ दूसरे राज्यों से जुड़े वित्तीय लेनदेन की पड़ताल भी जरूरी होती है। जांच आगे बढ़ने पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन खातों का इस्तेमाल किन गतिविधियों में हुआ और नेटवर्क में अन्य लोगों की क्या भूमिका थी।
आम लोगों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
- कमीशन या आसान कमाई के बदले अपना बैंक खाता किसी दूसरे को इस्तेमाल न करने दें।
- एटीएम कार्ड, पिन, ओटीपी और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी किसी से साझा न करें।
- खाते में अनजान स्रोत से रकम आने पर उसे आगे ट्रांसफर करने के बजाय तुरंत बैंक से संपर्क करें।
- संदिग्ध लेनदेन दिखने पर बैंक और संबंधित साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था को तत्काल सूचना दें।
- यदि आपका खाता किसी दूसरे व्यक्ति ने इस्तेमाल किया है, तो लेनदेन के रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और जांच में सही जानकारी दें।
दुर्ग में सात गिरफ्तारियों के बाद अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा संदिग्ध खातों के पूरे लेनदेन और उनसे जुड़े लोगों की भूमिका को स्पष्ट करना होगा। कार्रवाई का व्यापक असर तभी सामने आएगा, जब रकम के स्रोत, उसके अंतिम लाभार्थियों और कथित नेटवर्क की पूरी कड़ी का पता चलेगा।




