छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की शानदार मिसाल: 250 किमी दूर ले जाकर अजगर के मुंह से निकाला ट्यूमर, 3 घंटे चला ऑपरेशन
अंबिकापुर/बिलासपुर। जंगल में रहने वाले वन्यजीव अक्सर बीमारी या गंभीर चोट लगने पर समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में एक भारतीय अजगर के लिए की गई पहल ने उम्मीद की नई मिसाल पेश की है। सरगुजा के स्नेक मैन सत्यम द्विवेदी ने मुंह में ट्यूमर से जूझ रहे एक विशाल इंडियन रॉक पाइथन को बेहतर इलाज के लिए अंबिकापुर से बिलासपुर पहुंचाया। यहां विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. पीयूष दुबे ने करीब तीन घंटे तक सर्जरी कर ट्यूमर निकालने की प्रक्रिया पूरी की।
ऑपरेशन के बाद अजगर की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है। पूरी तरह स्वस्थ होने और प्राकृतिक वातावरण में जीवित रहने के योग्य पाए जाने के बाद उसे जंगल में छोड़ने की योजना है।
अजगर के मुंह में ट्यूमर का पता चला, फिर शुरू हुई इलाज की कोशिश
सत्यम द्विवेदी ने बताया कि रेस्क्यू किए गए भारतीय अजगर के मुंह में ट्यूमर होने की जानकारी मिलने के बाद उसके उपचार की व्यवस्था करना जरूरी हो गया था। वन्यजीव के लिए उपयुक्त चिकित्सा सुविधा और विशेषज्ञ सलाह की जरूरत को देखते हुए उसे बिलासपुर ले जाने का निर्णय लिया गया।
अंबिकापुर से बिलासपुर तक लगभग 250 किलोमीटर की दूरी तय कर अजगर को विशेषज्ञ चिकित्सक तक पहुंचाया गया। इसके बाद डॉक्टरों ने करीब तीन घंटे तक जटिल सर्जरी की और ट्यूमर निकालने की प्रक्रिया पूरी की।
सरीसृपों का उपचार सामान्य पालतू जानवरों के इलाज से अलग हो सकता है। उनके शरीर की बनावट, शारीरिक क्रियाओं और बीमारी की प्रकृति को ध्यान में रखकर उपचार करना पड़ता है। विशेष रूप से मुंह में मौजूद ट्यूमर भोजन निगलने और सामान्य रूप से खाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इस अजगर में ट्यूमर के कारण और उसके आकार को लेकर विस्तृत चिकित्सकीय जानकारी उपलब्ध नहीं है।
ऑपरेशन के बाद अब निगरानी, स्वस्थ होने पर जंगल में वापसी
सर्जरी पूरी होना उपचार का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसके बाद भी वन्यजीव की देखभाल जरूरी होती है। अजगर की स्थिति पर निगरानी रखी जा रही है, ताकि उसकी रिकवरी का आकलन किया जा सके और जरूरत के अनुसार आगे का उपचार दिया जा सके।
जंगली जीव को प्राकृतिक आवास में छोड़ने से पहले यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होता है कि वह पर्याप्त रूप से स्वस्थ हो, सामान्य गतिविधियां कर सके और अपने वातावरण में जीवित रहने की क्षमता रखता हो। इसलिए केवल ऑपरेशन सफल होने के आधार पर उसे तुरंत जंगल में छोड़ना उचित नहीं होगा।
सत्यम द्विवेदी के अनुसार, अजगर के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उसे उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा। यह कदम उसके उपचार के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण के उद्देश्य को भी पूरा करेगा।
वन्यजीवों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत में सांपों और अन्य वन्यजीवों के रेस्क्यू के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आती हैं, जहां प्राथमिक सहायता के बाद विशेषज्ञ चिकित्सा की जरूरत पड़ती है। हर शहर में वन्यजीवों की सर्जरी और विशेष उपचार की सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे में रेस्क्यू करने वाले लोगों, पशु चिकित्सकों और संबंधित वन विभाग के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस घटना से यह भी समझ आता है कि वन्यजीव संरक्षण का अर्थ केवल सांप या दूसरे जीव को सुरक्षित स्थान से पकड़कर जंगल में छोड़ देना नहीं है। यदि कोई जीव गंभीर रूप से घायल या बीमार है, तो उसके उपचार, रिकवरी और सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों की निगरानी में इलाज, सुरक्षित परिवहन और स्वस्थ होने के बाद प्राकृतिक आवास में वापसी जैसे कदम वन्यजीव संरक्षण की प्रभावी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
सत्यम द्विवेदी की पहल ने खींचा ध्यान
सरगुजा में स्नेक मैन के नाम से पहचाने जाने वाले सत्यम द्विवेदी वन्यजीवों के रेस्क्यू से जुड़े हैं। इस मामले में उन्होंने अजगर को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए लंबी दूरी तय करने की पहल की।
इस प्रयास का महत्व इसलिए भी है कि सांपों को लेकर समाज में आज भी भय और कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं। जबकि सांप पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और कई प्रजातियां पर्यावरण में प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं।
ऐसे मामलों में प्रशिक्षित रेस्क्यू कर्मियों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की मदद लेना जरूरी है। आम लोगों को बीमार या घायल सांप को खुद पकड़ने, उसके मुंह को खोलने या घरेलू उपचार करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
फिलहाल, भारतीय अजगर की रिकवरी पर नजर रखी जा रही है। उसकी पूरी तरह स्वस्थ होकर प्राकृतिक आवास में वापसी इस प्रयास का अगला महत्वपूर्ण चरण होगा। यह घटना बताती है कि वन्यजीव संरक्षण में संवेदनशीलता के साथ-साथ विशेषज्ञ चिकित्सा और उचित देखभाल भी बेहद जरूरी हैं।



