दुर्ग विश्वविद्यालय में बड़ा प्रशासनिक झटका: कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप निलंबित, ₹1.49 लाख के मामले से बढ़ी मुश्किलें
दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले ने नया मोड़ ले लिया है। राज्य शासन ने विश्वविद्यालय के कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उच्च शिक्षा विभाग ने 12 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में आदेश जारी किया। शासन के आदेश में एक महिला कर्मचारी के वेतन से कथित तौर पर 1.49 लाख रुपये से अधिक की राशि दूसरे खाते में ट्रांसफर कराने, पद के अधिकारों के इस्तेमाल में अनियमितता और अन्य मामलों का उल्लेख किया गया है।
यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब कुलदीप को पद से हटाकर उच्च शिक्षा संचालनालय में अटैच करने के पिछले आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। ताजा निलंबन आदेश से विश्वविद्यालय के प्रशासनिक घटनाक्रम ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है।
हाईकोर्ट से राहत के बाद शासन का निलंबन आदेश
भूपेंद्र कुमार कुलदीप को 29 सितंबर को कुलसचिव के पद से हटाकर रायपुर स्थित उच्च शिक्षा संचालनालय में अटैच किया गया था। उनकी जगह दुर्ग के शासकीय वीवाईटी पीजी कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार पांडेय को प्रभारी कुलसचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
कुलदीप ने शासन के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 9 अक्टूबर को अदालत ने अटैचमेंट संबंधी आदेश निरस्त कर दिया। इसके बाद कुलदीप विश्वविद्यालय में दोबारा जॉइनिंग देने पहुंचे, लेकिन उनके कक्ष में ताला लगा मिला।
अब 12 अक्टूबर को राज्य शासन ने उन्हें निलंबित करने का नया आदेश जारी किया है। यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 9(1)(क) के तहत की गई है। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय उच्च शिक्षा संचालनालय, इंद्रावती भवन, अटल नगर, नवा रायपुर निर्धारित किया गया है।
महिला कर्मचारी के वेतन से जुड़ा है ₹1.49 लाख का मामला
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू विश्वविद्यालय की दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी शुभांगी मराठे के वेतन से जुड़ी शिकायत है। शिकायत के अनुसार, कर्मचारी का मासिक वेतन 11,515 रुपये निर्धारित था, लेकिन कथित तौर पर उन्हें केवल 2,200 रुपये दिए जाते थे। शेष रकम फोनपे या पेटीएम के माध्यम से कुलदीप के बेटे के खाते में ट्रांसफर कराए जाने का आरोप है।
पुलिस के मुताबिक, 6 फरवरी 2025 से 4 जुलाई 2026 के बीच इस मामले में कथित रूप से 1,49,384 रुपये का लेनदेन हुआ। इसी शिकायत के आधार पर दुर्ग के मोहन नगर थाने में 3 अगस्त 2026 को एफआईआर दर्ज की गई थी। कुलदीप को उसी दिन गिरफ्तार किया गया था, हालांकि बाद में उन्हें थाने से मुचलके पर रिहा कर दिया गया।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। एफआईआर दर्ज होना या निलंबन की कार्रवाई होना अपने आप में आरोप सिद्ध होने के बराबर नहीं है। मामले में आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण अदालत करेगी, जबकि विभागीय जांच में सेवा नियमों और प्रशासनिक आचरण से जुड़े सवालों की पड़ताल की जाएगी।
पद के अधिकारों के इस्तेमाल पर भी उठे सवाल
राज्य शासन के आदेश में दुर्ग संभाग के आयुक्त की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि कुलपति से अधिकार प्राप्त किए बिना कुलसचिव द्वारा अपने स्तर पर अधिकारों का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई। शासन ने इसे गंभीर प्रशासनिक अनियमितता के रूप में लिया है।
मामले में 24 जुलाई को जारी कारण बताओ नोटिस और 10 अक्टूबर को विभागीय जांच शुरू करने के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया गया है। इससे पहले 29 अगस्त को विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने कुलदीप के वित्तीय अधिकार वापस लेने का निर्णय लिया था।
इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि विवाद केवल एक कर्मचारी के वेतन से जुड़े आरोपों तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालय में वित्तीय निर्णय लेने की प्रक्रिया, अधिकारियों के अधिकारों की सीमा और संस्थागत निगरानी भी जांच के दायरे में हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए क्यों अहम है यह मामला?
विश्वविद्यालयों में कुलसचिव का पद प्रशासनिक कामकाज, रिकॉर्ड प्रबंधन, वित्तीय प्रक्रियाओं और संस्थागत निर्णयों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस पद से जुड़े किसी भी विवाद का असर केवल संबंधित अधिकारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कर्मचारियों के भरोसे और संस्थान की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है।
विशेष रूप से दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में वेतन का समय पर और पूरी राशि में भुगतान होना आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। यदि वेतन भुगतान की प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो संबंधित संस्थान के लिए भुगतान रिकॉर्ड, बैंक लेनदेन, स्वीकृति प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अब यह सुनिश्चित करने की चुनौती भी होगी कि कुलसचिव के निलंबन के कारण नियमित प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज प्रभावित न हो। जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा और रिकॉर्ड की पारदर्शिता संस्थान में भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
आगे क्या होगा?
राज्य शासन के ताजा आदेश के बाद मामले में विभागीय जांच और पुलिस की कानूनी प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण होंगी। विभागीय जांच में यह देखा जाएगा कि क्या सेवा नियमों का उल्लंघन हुआ और संबंधित अधिकारी की क्या जिम्मेदारी बनती है। वहीं, आपराधिक मामले में लेनदेन और शिकायत से जुड़े साक्ष्यों का परीक्षण कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।
फिलहाल, भूपेंद्र कुमार कुलदीप का निलंबन तत्काल प्रभाव से लागू है। आने वाले समय में जांच के निष्कर्ष और शासन के अगले फैसले यह स्पष्ट करने में अहम होंगे कि विश्वविद्यालय में सामने आए आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई होती है।



