जम्मू-कश्मीर में बड़ा सुरक्षा अलर्ट! सोपोर के जंगल में AK-47, 3 IED और ग्रेनेड लॉन्चर बरामद
श्रीनगर: उत्तरी कश्मीर में सुरक्षा बलों को हथियारों और विस्फोटकों का एक बड़ा जखीरा मिला है। सोपोर के पास मकाम चेरहार जंगल में चलाए गए तलाशी अभियान के दौरान दो असॉल्ट राइफल, चार पिस्तौल, तीन इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) और ग्रेनेड लॉन्चर समेत कई हथियार बरामद किए गए। पुलिस के मुताबिक, संदिग्ध सामग्री एक बड़े पत्थर के नीचे छिपाए गए नीले ड्रम और बैग में रखी गई थी।
इस बरामदगी के बाद जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि हथियार वहां किसने छिपाए थे, उन्हें किस उद्देश्य से जमा किया गया था और क्या इनका संबंध किसी सक्रिय आतंकी नेटवर्क से है। खास बात यह है कि इससे पहले 7 अक्टूबर को उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा स्थित नागदानार जंगल में भी हथियारों और भारी मात्रा में कारतूसों का जखीरा मिला था। दोनों घटनाएं क्षेत्र में छिपाए गए हथियारों के पुराने ठिकानों की पहचान करने और संभावित सुरक्षा खतरों की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
खुफिया सूचना पर पुलिस, सेना और CRPF का संयुक्त अभियान
सोपोर पुलिस को मिली विशेष सूचना के आधार पर पुलिस, सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों ने बोम्मई थाना क्षेत्र के अंतर्गत मकाम चेरहार जंगल में तलाशी अभियान चलाया।
अभियान के दौरान सुरक्षाकर्मियों को एक बड़े पत्थर के नीचे नीले रंग का ड्रम और एक बैग छिपा हुआ मिला। उसमें हथियारों के साथ विस्फोटक सामग्री भी होने के कारण बम निरोधक दस्ते को मौके पर बुलाया गया। ऐसी परिस्थितियों में विस्फोटकों की सुरक्षित जांच और निष्क्रियकरण जरूरी होता है, क्योंकि संदिग्ध उपकरणों को बिना विशेषज्ञ जांच के छूना या हटाना गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
पुलिस ने बरामद सामग्री को कब्जे में लेकर आगे की जांच शुरू कर दी है। इस अभियान की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि जंगलों में छिपाए गए हथियारों का पता लगाना सामान्य तलाशी से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
बरामदगी में क्या-क्या मिला?
पुलिस के अनुसार, सोपोर के जंगल से बरामद सामग्री में हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक उपकरण शामिल हैं।
- एक AK-47 और एक AK-76 राइफल
- सात मैगजीन
- चार पिस्तौल
- एक मल्टी ग्रेनेड लॉन्चर (MGL) और उसके पांच राउंड
- 11 हैंड ग्रेनेड
- रिमोट कंट्रोल सहित तीन IED
- आठ डेटोनेटर और दो टाइमर
- तार, बैटरी सेल, प्राइमा कॉर्ड और अन्य संदिग्ध उपकरण
बरामद सामग्री में मौजूद रिमोट कंट्रोल, डेटोनेटर और टाइमर जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। हालांकि, केवल इन उपकरणों की मौजूदगी से किसी खास हमले की योजना या उसके संभावित निशाने के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए फॉरेंसिक जांच, तकनीकी विश्लेषण और अन्य सबूतों की जरूरत होगी।
हंदवाड़ा में तीन दिन पहले मिला था हथियारों का दूसरा जखीरा
सोपोर की कार्रवाई से कुछ दिन पहले, 7 अक्टूबर को हंदवाड़ा के नागदानार वन क्षेत्र में पुलिस, सेना की 21 राष्ट्रीय राइफल्स और CRPF की 92वीं बटालियन ने संयुक्त तलाशी अभियान चलाया था। वहां एक पुराने ठिकाने से हथियार और बड़ी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया गया था। <Cite refs={[“turn594238search2”,“turn594238search8”]}/>
उस कार्रवाई में एक AK-47 राइफल, तीन ग्रेनेड, AK राइफल के 857 कारतूस, PIKA के 192 कारतूस, आठ AK मैगजीन, एक साइलेंसर और पिस्तौल के 83 कारतूस मिले थे।
दोनों बरामदगियों में कुछ दिनों का अंतर सुरक्षा एजेंसियों के लिए जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है। हालांकि, अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि सोपोर और हंदवाड़ा में मिले हथियार एक ही नेटवर्क या किसी साझा योजना से जुड़े हैं। यह संबंध जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
जांच एजेंसियों के सामने अब कौन-से सवाल हैं?
हथियारों का जखीरा मिलने के बाद सबसे अहम काम केवल सामग्री जब्त करना नहीं, बल्कि उसके स्रोत और संभावित इस्तेमाल का पता लगाना है। जांच में कई पहलुओं पर ध्यान दिया जा सकता है।
हथियार वहां कैसे पहुंचे? जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश करेंगी कि हथियारों को जंगल तक कौन लाया और उन्हें कितने समय पहले छिपाया गया था।
क्या कोई सक्रिय नेटवर्क इससे जुड़ा है? बरामद सामग्री, तकनीकी साक्ष्य और अन्य खुफिया जानकारियों के आधार पर संभावित संपर्कों की जांच की जा सकती है।
क्या दोनों घटनाओं में कोई संबंध है? सोपोर और हंदवाड़ा में मिले हथियारों की प्रकृति तथा अन्य सबूतों का विश्लेषण यह समझने में मदद कर सकता है कि दोनों मामलों के बीच कोई कड़ी है या नहीं।
पुलिस ने सोपोर के बोम्मई थाने में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की है।
उत्तरी कश्मीर की सुरक्षा के लिए क्यों अहम है यह कार्रवाई?
जंगलों या सुनसान स्थानों पर हथियार छिपाकर रखने से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती पैदा होती है। ऐसे ठिकानों का इस्तेमाल बाद में हथियारों की आपूर्ति के लिए किया जा सकता है, हालांकि इस मामले में ऐसा कोई इस्तेमाल हुआ था या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है।
हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी से संभावित खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, यदि जांच के जरिए हथियारों की आपूर्ति करने वालों या उन्हें छिपाने वाले लोगों की पहचान होती है, तो संबंधित नेटवर्क के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
लेकिन किसी कार्रवाई की वास्तविक सफलता का आकलन केवल बरामद हथियारों की संख्या से नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह भी देखना होगा कि जांच से कितनी ठोस जानकारी मिलती है, संभावित आरोपियों की पहचान होती है या नहीं और क्षेत्र में सुरक्षा जोखिमों को कम करने में कितना प्रभाव पड़ता है।
आगे की जांच पर टिकी नजर
सोपोर में हथियारों और IED की बरामदगी के बाद सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान अब इनके स्रोत, स्वामित्व और संभावित संबंधों की जांच पर है। हंदवाड़ा में हाल में हुई बरामदगी के साथ इन घटनाओं का तुलनात्मक विश्लेषण भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
फिलहाल पुलिस की जांच पूरी होने से पहले किसी आतंकी संगठन, व्यक्ति या कथित साजिश को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। आने वाले दिनों में जांच से मिलने वाले साक्ष्य ही यह स्पष्ट करेंगे कि जंगल में छिपाए गए हथियारों के पीछे कौन था और उनसे किस तरह का खतरा पैदा हो सकता था।



