RTO का चौंकाने वाला खेल: ब्लैकलिस्ट ऑटो रातोंरात हुआ फिट, बदला मालिकाना हक तो उठे गंभीर सवाल
मुरादाबाद। सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज एक वाहन की कहानी ने परिवहन विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक महिला का दावा है कि जिस ऑटो को उन्होंने वर्ष 2016 में खरीदा था, उसके पंजीकरण के लिए वह वर्षों तक आरटीओ कार्यालय के चक्कर लगाती रहीं। लेकिन बाद में उसी चेसिस और इंजन नंबर पर वाहन किसी दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज मिला।
मामला यहीं नहीं रुका। रिकॉर्ड के मुताबिक वाहन वर्ष 2019 से ब्लैकलिस्ट था, लेकिन 2026 में उसकी स्थिति में कथित तौर पर ऐसा बदलाव हुआ कि कुछ समय के लिए ब्लैकलिस्ट हटाई गई और वाहन की फिटनेस दर्ज कर दी गई। फिटनेस प्रक्रिया पूरी होने के बाद वाहन को फिर ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
यही बदलाव अब पूरे मामले का सबसे अहम हिस्सा बन गया है।
छह साल पुराने वाहन की फाइल ने खोले कई सवाल
बिलारी तहसील के मसेबी रसूलपुर गांव की रुखसाना बेगम के मुताबिक उन्होंने वर्ष 2016 में बजाज एजेंसी से नया ऑटो खरीदा था। एजेंसी की ओर से उन्हें बिक्री प्रमाणपत्र, संबंधित फॉर्म और बिल समेत दस्तावेज दिए गए थे।
उनका कहना है कि इन्हीं कागजात के आधार पर वाहन का पंजीकरण और परमिट कराने के लिए आरटीओ कार्यालय से संपर्क किया गया, लेकिन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
परिवार की आर्थिक जरूरतों ने उन्हें इंतजार करने का मौका नहीं दिया। दस्तावेज पूरे न होने के बावजूद ऑटो चलाना पड़ा। परिणाम यह हुआ कि वाहन तीन बार पकड़ा गया और सीज हुआ। उसे छुड़ाने में करीब 70 हजार रुपये खर्च होने का दावा किया गया है।
एक छोटे वाहन पर निर्भर परिवार के लिए यह रकम मामूली नहीं होती। यही वजह है कि ऑटो का प्रशासनिक विवाद धीरे-धीरे परिवार के आर्थिक संकट में बदल गया।
सबसे बड़ा सवाल: एक ही चेसिस नंबर पर दो दावे कैसे?
मामले का गंभीर पहलू तब सामने आया जब रुखसाना ने वाहन के रिकॉर्ड की जानकारी लेने की कोशिश की।
उनके अनुसार, रिकॉर्ड में वाहन उनके नाम दर्ज होने के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति के नाम दिखाई दिया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि उसी चेसिस और इंजन नंबर पर दूसरे व्यक्ति को पंजीकरण के साथ सिटी परमिट तक जारी कर दिया गया।
वाहन की पहचान उसके चेसिस और इंजन नंबर से जुड़ी होती है। इसलिए इन मूल विवरणों से संबंधित रिकॉर्ड में किसी भी तरह की गड़बड़ी महज कागजी त्रुटि मानकर छोड़ देने वाला मामला नहीं है। इसकी जांच में खरीद के दस्तावेज, डीलर रिकॉर्ड, पंजीकरण आवेदन, पोर्टल लॉग और परमिट से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान जरूरी होगा।
ब्लैकलिस्ट वाहन की फिटनेस ने बढ़ाया संदेह
इस मामले में सबसे असामान्य घटनाक्रम वाहन की फिटनेस को लेकर सामने आया है।
शिकायत के मुताबिक ऑटो वर्ष 2019 में ब्लैकलिस्ट था। इसके बावजूद 2026 में ऑनलाइन रिकॉर्ड में उसकी स्थिति बदली गई। कुछ समय के लिए ब्लैकलिस्ट हटाई गई और फिटनेस से संबंधित प्रविष्टि दर्ज की गई। फिटनेस प्रक्रिया पूरी होने के बाद वाहन को फिर ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
यहीं से जांच का असली सिरा निकलता है।
अगर वाहन वास्तव में ब्लैकलिस्ट था तो फिटनेस के समय उसकी स्थिति क्या थी? ब्लैकलिस्ट हटाने का अधिकार किस स्तर पर था? बदलाव किस यूजर आईडी से किया गया? कितनी देर के लिए स्थिति बदली गई? फिटनेस किस अधिकारी या कर्मचारी की प्रक्रिया से हुई? और फिटनेस के बाद वाहन फिर से ब्लैकलिस्ट कैसे हुआ?
इन सवालों के जवाब डिजिटल सिस्टम के लॉग से निकाले जा सकते हैं।
डिजिटल सिस्टम ने आसान किया रिकॉर्ड, लेकिन जवाबदेही भी जरूरी
ऑनलाइन सरकारी पोर्टल का उद्देश्य कागजी प्रक्रिया कम करना और रिकॉर्ड में पारदर्शिता बढ़ाना है। लेकिन किसी डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव की सुविधा तभी भरोसेमंद मानी जा सकती है, जब हर महत्वपूर्ण परिवर्तन का ऑडिट ट्रेल सुरक्षित हो।
यानी सिस्टम यह बता सके कि किस यूजर ने, किस समय, किस रिकॉर्ड में, क्या बदलाव किया और बाद में उसे किसने स्वीकृत किया।
इस मामले में जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि वाहन किसके नाम दर्ज हुआ। यह भी देखना होगा कि रिकॉर्ड में बदलाव की पूरी डिजिटल श्रृंखला क्या कहती है।
यदि किसी कर्मचारी ने नियमों के विपरीत रिकॉर्ड बदला है तो जिम्मेदारी तय करना संभव होना चाहिए। और यदि तकनीकी या प्रक्रियागत खामी के कारण बदलाव हुआ है तो वह भी सामने आना चाहिए।
ऑटो बेचने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ
लगातार आर्थिक नुकसान और वाहन से जुड़ी परेशानियों के बीच रुखसाना ने कथित तौर पर ऑटो को 90 हजार रुपये में दूसरे व्यक्ति को बेच दिया। लेकिन बिक्री के बाद भी वाहन का रिकॉर्ड संबंधी विवाद खत्म नहीं हुआ।
यह स्थिति बताती है कि वाहन का भौतिक कब्जा और सरकारी रिकॉर्ड में उसका मालिकाना हक दो अलग-अलग चीजें हैं। सड़क पर वाहन किसी व्यक्ति के पास हो सकता है, लेकिन कानूनी तौर पर उसकी स्थिति पंजीकरण रिकॉर्ड से तय होती है।
इसीलिए गलत पंजीकरण किसी वाहन के वास्तविक खरीदार को भविष्य में परमिट, बीमा, चालान, दुर्घटना या स्वामित्व विवाद जैसी कई समस्याओं में फंसा सकता है।
जांच में किन बिंदुओं पर होना चाहिए फोकस?
इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए कुछ रिकॉर्ड विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे—
- 2016 में एजेंसी से जारी बिक्री दस्तावेज और बिल
- मूल पंजीकरण आवेदन और उससे जुड़े दस्तावेज
- उसी चेसिस और इंजन नंबर का वर्तमान तथा पुराना रिकॉर्ड
- दूसरे व्यक्ति के नाम पंजीकरण की पूरी प्रक्रिया
- सिटी परमिट जारी होने की फाइल
- 2019 में वाहन को ब्लैकलिस्ट किए जाने का आधार
- 2026 में ब्लैकलिस्ट स्थिति हटाने का डिजिटल लॉग
- फिटनेस दर्ज करने वाले अधिकारी/कर्मचारी का रिकॉर्ड
- ब्लैकलिस्ट दोबारा लागू करने की प्रक्रिया
- संबंधित यूजर आईडी और सिस्टम ऑडिट ट्रेल
इन दस्तावेजों का मिलान होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामला मानवीय गलती, तकनीकी गड़बड़ी या जानबूझकर किए गए रिकॉर्ड परिवर्तन में से किस श्रेणी में आता है।
अधिकारी बोले- जांच में दोषी पर होगी कार्रवाई
मामले को लेकर विभाग की ओर से जांच की बात कही गई है। अधिकारी के मुताबिक प्रथमदृष्टया पंजीकरण और परमिट गलत जारी होने के कारण उसे निरस्त करने की कार्रवाई की गई है। जांच के बाद जिस स्तर पर भी दोष सामने आएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
अब इस जांच की निष्पक्षता ही सबसे महत्वपूर्ण होगी। क्योंकि शिकायतकर्ता का आरोप सिर्फ गलत पंजीकरण का नहीं, बल्कि सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड में बाद में हुए संदिग्ध बदलाव का भी है।
असली परीक्षा व्यवस्था की है
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक यही है कि डिजिटल रिकॉर्ड अपने आप में पारदर्शिता की गारंटी नहीं है। पारदर्शिता तब बनती है जब सिस्टम में हुए प्रत्येक बदलाव की जिम्मेदारी तय की जा सके।
अगर जांच यह साबित करती है कि ब्लैकलिस्ट वाहन को जानबूझकर थोड़े समय के लिए सिस्टम में सामान्य दिखाकर फिटनेस कराई गई, तो यह सिर्फ एक ऑटो का मामला नहीं रहेगा। इससे परिवहन विभाग के रिकॉर्ड और आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठेंगे।
वहीं यदि तकनीकी त्रुटि सामने आती है तो विभाग के लिए सिस्टम ऑडिट और निगरानी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस वाहन को वर्षों तक दस्तावेजों के लिए परेशान होना पड़ा, उसी वाहन का रिकॉर्ड आखिर किस प्रक्रिया के तहत बदला गया? इसका जवाब केवल संबंधित महिला को न्याय दिलाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे परिवहन रिकॉर्ड सिस्टम पर लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है।



