प्रेस की निगरानी करने वाली संस्था ही अधूरी! प्रेस काउंसिल में पत्रकारों की गैरमौजूदगी पर बड़ा सवाल
भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के मानकों पर नजर रखने वाली संस्था अगर खुद पूरी तरह गठित न हो, तो सवाल केवल खाली पदों का नहीं रहता। यह संस्थागत प्रतिनिधित्व और उसकी कार्यक्षमता से जुड़ा विषय बन जाता है।
Press Council of India (PCI) इस समय अपनी स्वीकृत सदस्य संख्या के मुकाबले करीब आधी ताकत के साथ काम कर रही है और मौजूदा संरचना में एक भी कार्यरत पत्रकार या अखबार संपादक शामिल नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस की 7 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने PCI द्वारा नामित 13 सदस्यों के नाम अब तक औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किए हैं। मंत्रालय ने कहा है कि प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद अधिसूचना जल्द जारी होने की उम्मीद है।
सवाल सिर्फ 13 नामों का नहीं, प्रतिनिधित्व का है
Press Council Act, 1978 के तहत परिषद में चेयरपर्सन के अलावा 28 सदस्य होने चाहिए। इनमें पत्रकारिता जगत के अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था है। छह सदस्य अखबारों के संपादकों और सात सदस्य संपादक के अलावा कार्यरत पत्रकारों में से होते हैं।
यानी कुल 13 सदस्य सीधे पत्रकारिता के पेशेवर पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यही वजह है कि इन पदों का लंबे समय तक खाली रहना सामान्य प्रशासनिक देरी की तरह नहीं देखा जा सकता। प्रेस से जुड़े मामलों पर विचार करने वाली संस्था में पत्रकार समुदाय की प्रत्यक्ष मौजूदगी उसके प्रतिनिधिक चरित्र का अहम हिस्सा है।
15वीं प्रेस काउंसिल अब तक पूरी तरह क्यों नहीं बन पाई?
14वीं प्रेस काउंसिल का कार्यकाल अक्टूबर 2024 में समाप्त हुआ था। इसके बाद 15वीं परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन इसमें कई स्तरों पर समय लगा।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, मई 2026 में भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 15वीं प्रेस काउंसिल के पुनर्गठन की प्रक्रिया को जारी बताया था। उस समय विभिन्न श्रेणियों के नामांकन और दावों की प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे थे।
बाद में पत्रकार और संपादक वर्ग से जुड़े 13 सदस्यों के नाम PCI की ओर से नामित किए गए। लेकिन इन नामों की औपचारिक सरकारी अधिसूचना अभी तक लंबित बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक PCI ने मंत्रालय को मई, जुलाई और सितंबर में अलग-अलग पत्र भेजकर Gazette notification जारी करने का आग्रह किया।
चेयरपर्सन की नियुक्ति भी लंबे इंतजार के बाद हुई
इस पूरी प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू परिषद के नेतृत्व से जुड़ा है।
रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई का पिछला कार्यकाल दिसंबर 2025 में समाप्त हुआ था। इसके बाद करीब चार महीने तक चेयरपर्सन का पद खाली रहा। अप्रैल 2026 में उनकी दोबारा नियुक्ति हुई।
इससे यह स्पष्ट होता है कि 15वीं परिषद के गठन में समस्या केवल सदस्य नियुक्तियों तक सीमित नहीं रही। परिषद की नेतृत्व संरचना भी एक अवधि तक रिक्त रही।
आधी ताकत में भी बैठकों का सिलसिला जारी
दिलचस्प बात यह है कि परिषद पूरी सदस्य संख्या के बिना भी निष्क्रिय नहीं हुई है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक PCI की बैठकें जारी रही हैं और जून में इसकी आखिरी बैठक हुई थी, जबकि इस महीने एक और बैठक प्रस्तावित है।
इससे एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—संस्था का काम करते रहना और उसका पूरी तरह प्रतिनिधिक होना एक ही बात नहीं है।
किसी संस्था की बैठकें हो सकती हैं, फैसले लिए जा सकते हैं और शिकायतों पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन यदि कानून में जिन पेशेवर समूहों को प्रतिनिधित्व देने की स्पष्ट व्यवस्था है, वे ही अनुपस्थित हों, तो उसकी संरचनात्मक पूर्णता पर सवाल बना रहता है।
संसद में भी उठ चुका है मुद्दा
परिषद के गठन में देरी का मुद्दा संसद में भी उठाया जा चुका है। फरवरी 2026 में बीजेडी सांसद सस्मित पात्रा ने परिषद के गठन और चेयरपर्सन की नियुक्ति में देरी पर चिंता जताते हुए सरकार से मामले को गंभीरता से लेने और आवश्यक कदम उठाने की मांग की थी।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि PCI सिर्फ पत्रकार संगठनों की आंतरिक संस्था नहीं है। यह संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत गठित एक वैधानिक, अर्ध-न्यायिक निकाय है, जिसका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखना और पत्रकारिता के मानकों को सुधारना है।
प्रेस काउंसिल की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
प्रेस काउंसिल की भूमिका को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि यह केवल पत्रकारों की शिकायतों पर विचार करने वाली संस्था नहीं है। इसके दायरे में प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारिता की आचार-संहिता और मीडिया से संबंधित शिकायतों जैसे विषय आते हैं।
ऐसे समय में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया के बीच सीमाएं तेजी से बदल रही हैं, प्रेस की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल और जटिल हो रहे हैं।
फर्जी खबरों, सनसनीखेज रिपोर्टिंग, निजता, प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की जवाबदेही के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों में और चुनौतीपूर्ण होगा। ऐसे माहौल में जिस संस्था को प्रेस के मानकों पर नजर रखनी है, उसका पूर्ण और विविध प्रतिनिधित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकार के लिए अगली परीक्षा सिर्फ अधिसूचना जारी करना नहीं
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कहा है कि 13 नामों की अधिसूचना अंतिम चरण में है। इसलिए अब सबसे सीधा समाधान यही है कि आवश्यक औपचारिकताएं जल्द पूरी हों और 15वीं प्रेस काउंसिल को उसकी निर्धारित संरचना के अनुरूप पूर्ण किया जाए।
लेकिन लंबी अवधि में इससे बड़ा सबक भी निकलता है। वैधानिक संस्थाओं के गठन में देरी को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर छोड़ देना संस्थागत प्रभावशीलता के लिहाज से उचित नहीं होगा।
खासकर मीडिया जैसे क्षेत्र में, जहां संस्था की विश्वसनीयता उसके प्रतिनिधित्व से भी तय होती है, समय पर नियुक्ति उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सही व्यक्ति की नियुक्ति।
आगे क्या होगा?
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि मंत्रालय 13 नामों की अधिसूचना कब जारी करता है और 15वीं प्रेस काउंसिल कब पूरी तरह अपनी निर्धारित संरचना में काम शुरू करती है।
अगर अधिसूचना जल्द जारी होती है तो लंबे समय से चली आ रही एक महत्वपूर्ण संस्थागत रिक्तता दूर हो सकती है। लेकिन इससे आगे भी सवाल रहेगा कि भविष्य में ऐसी नियुक्ति प्रक्रियाओं को समयबद्ध कैसे बनाया जाए।
आखिर प्रेस की स्वतंत्रता पर बहस केवल खबरों में लिखे शब्दों तक सीमित नहीं है। उस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाली संस्थाओं का मजबूत, प्रतिनिधिक और समय पर गठित होना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की उतनी ही महत्वपूर्ण कड़ी है।



