SIR पर गंभीर विवाद: ओवैसी ने Form-7 के कथित दुरुपयोग पर दी बड़ी चेतावनी, चुनाव आयोग से जांच की मांग
हैदराबाद: मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अब सिर्फ चुनावी प्रक्रिया तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। तेलंगाना में Form-7 को लेकर AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी के आरोपों ने मतदाता अधिकार, चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक दलों की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है।
ओवैसी ने आरोप लगाया है कि कुछ जगहों पर ऐसे Form-7 आवेदन दाखिल किए जा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश के लिए किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव आयोग से शिकायतों की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी कि यदि कथित अनियमितताएं नहीं रुकीं तो AIMIM बड़े विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपना सकती है।
हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
Form-7 क्या है और विवाद कहां से शुरू हुआ?
Form-7 चुनावी सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या निर्धारित कारणों के आधार पर किसी मौजूदा नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यानी इसका इस्तेमाल कानूनन उपलब्ध चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है, अपने आप में कोई अवैध दस्तावेज नहीं।
विवाद तब पैदा होता है जब किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए गलत या अपूर्ण जानकारी के साथ आवेदन दाखिल किए जाने का आरोप लगे।
ओवैसी का दावा है कि कुछ कथित तौर पर पहले से तैयार फॉर्म में उस मतदाता की जानकारी मौजूद थी, जिसका नाम हटाने की मांग की गई, लेकिन आवेदनकर्ता की जरूरी जानकारी नहीं थी। उन्होंने तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारियों से ऐसे मामलों की जांच करने की मांग की है।
असली सवाल: क्या Form-7 से सीधे कट जाता है वोट?
यहां मतदाताओं के लिए एक बेहद जरूरी तथ्य समझना आवश्यक है।
सिर्फ Form-7 दाखिल हो जाने से किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से स्वतः नहीं हटता। चुनावी अधिकारियों को आवेदन में दिए गए कारण और संबंधित जानकारी की जांच करनी होती है। रिपोर्टों के अनुसार तेलंगाना में अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर प्राप्त Form-7 आवेदनों की जांच और फील्ड वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पर जोर दिया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि किसी मतदाता का नाम केवल किसी शिकायत या आवेदन के आधार पर मनमाने ढंग से न हटे।
यही वजह है कि मौजूदा विवाद में राजनीतिक आरोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि निर्वाचन अधिकारी संदिग्ध आवेदनों की जांच किस तरह करते हैं और शिकायतों पर क्या कार्रवाई सामने आती है।
तेलंगाना में बढ़ा राजनीतिक तापमान
रिपोर्टों के मुताबिक तेलंगाना में Form-7 से जुड़े हजारों आवेदन सामने आए हैं। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के हवाले से बताया गया कि 1 अक्टूबर तक 28,753 Form-7 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें लगभग 5,000 आवेदन हैदराबाद से बताए गए। अधिकारियों ने कहा कि बड़ी संख्या में आने वाले आवेदनों की जांच की जाएगी।
इसी बीच कुछ राजनीतिक दलों की ओर से कथित रूप से पहले से भरे हुए या अधूरे Form-7 को लेकर शिकायतें भी सामने आई हैं। इन शिकायतों में हैदराबाद के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों का उल्लेख हुआ है। लेकिन किसी विशेष राजनीतिक संगठन या व्यक्ति की ओर से गैरकानूनी तरीके से वोट कटवाने की बात को अंतिम तथ्य मानने से पहले आधिकारिक जांच का परिणाम देखना जरूरी है।
ओवैसी का SIR पर पहले से विरोध
यह पहली बार नहीं है जब ओवैसी ने SIR को लेकर सवाल उठाए हैं। वे पहले भी इस प्रक्रिया की आलोचना करते हुए इसे नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की जांच से जोड़ने की आशंका जता चुके हैं। उन्होंने SIR को लेकर अपनी पार्टी के विरोध को सार्वजनिक रूप से दोहराया है।
दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग SIR को मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाने की चुनावी प्रक्रिया के रूप में संचालित कर रहा है। आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर SIR-2026 के तहत मतदाता अपना नाम खोजने और चुनावी सूची से जुड़ी सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसलिए मौजूदा बहस में दो अलग-अलग बातों को मिलाना ठीक नहीं होगा—SIR की वैध चुनावी प्रक्रिया और उस प्रक्रिया के संभावित दुरुपयोग के आरोप।
मतदाताओं के लिए सबसे जरूरी बात
इस विवाद का सीधा असर आम मतदाता पर पड़ता है। चुनावी सूची में नाम मौजूद होना मतदान के अधिकार के इस्तेमाल के लिए बुनियादी शर्त है। इसलिए किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता को अपने नाम की स्थिति जांचते रहना चाहिए।
चुनाव आयोग के Voter Services Portal पर मतदाता सूची से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध हैं और SIR-2026 के लिए पुराने SIR रिकॉर्ड में नाम खोजने की सुविधा भी दी गई है।
यदि किसी मतदाता को अपने नाम को लेकर नोटिस मिलता है या किसी गलत जानकारी की आशंका होती है, तो उसे आधिकारिक निर्वाचन कार्यालय के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। राजनीतिक दलों या सोशल मीडिया पर चल रही सूचनाओं के बजाय आधिकारिक रिकॉर्ड को अंतिम आधार बनाना अधिक सुरक्षित है।
आगे की राह जांच की पारदर्शिता तय करेगी
इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ मतदाता सूची को अपडेट करना नहीं, बल्कि हर आपत्ति और नाम हटाने के अनुरोध पर भरोसेमंद सत्यापन सुनिश्चित करना है।
अगर गलत Form-7 दाखिल किए जाने के आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई और प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी होगी। दूसरी तरफ, यदि किसी आवेदन को नियमों के तहत सही पाया जाता है, तो उसके आधार और सत्यापन प्रक्रिया को स्पष्ट करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
क्योंकि चुनावी लोकतंत्र में मतदाता सूची सिर्फ प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। यह तय करती है कि कौन व्यक्ति मतदान के जरिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग ले सकता है।



